वृन्दावन धाम तीर्थ है या.....

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Monday, November 11, 2013-9:25 AM
श्री कृष्ण ने प्रयाग को तीर्थ राज का पद प्रदान किया। समस्त तीर्थ प्रयाग राज की सभा में अपनी उपस्थिति देने लगे परंतु वृन्दावन उस राज सभा में अपनी उपस्थिति नहीं देते थे। एक रोज सभा लगी हुई थी एक तीर्थ ने प्रयाग राज से प्रश्न किया," राजन श्री कृष्ण ने आपको तीर्थ राज का पद प्रदान किया है परंतु उन्हीं का तीर्थ श्री वृन्दावन आपकी राजसभा में कभी उपस्थित नहीं होता। क्या यह आपका अपमान नहीं है? आपके अपमान के साथ यह श्री कृष्ण की आज्ञा का उल्लंघन भी है।"
 

तीर्थ राज को इस कथन में वास्तविकत दृष्ति गोचर हुई। प्रयाग राज श्री कृष्ण के समक्ष गए उन्होंने करबद्ध निवेदन किया," प्रभु आपने अपनी कृपा से मुझे तीर्थ राज का पद प्रदान किया है परंतु आपका ही तीर्थ मेरी राजसभा में उपस्थित नहीं होता हैं। यह मात्र मेरी उपेक्षा ही नहीं है वरन आपके विधान की अवमानना है। यह तो अपराध है।"

श्री राधा रानी जी की ओर देखकर श्री कृष्ण ने कहा," तीर्थ राज निश्चित ही मैंने आपको तीर्थ राज का पद प्रदान किया है परंतु अपने घर का स्वामी तो नहीं बना दिया है। वृन्दावन स्वामिनी श्री राधा रानी जी का एवं मेरा निजधाम है, कोई तीर्थ तो नहीं है।"।

तीर्थराज को वास्तविक स्थिति समझ में आ गई। श्री युगल किशोर के चरणों में प्रणाम निवेदन करके एवं वृन्दावन के चरणों में नमस्कार किया। उनसे अपने अपराध की क्षमा याचना की एवं त्रिवेणी वापस लौट आए। इस प्रसंग से यह तथ्य भलीभांति स्थापित हो जाता है कि वृन्दावन धाम तीर्थ नहीं है। वे साक्षात श्री राधा रानी जी का एवं श्री कृष्ण का निज निवास है, निज विहार स्थल है, निज महल है।

जहां श्री राधा रानी जी एवं श्री कृष्ण साक्षात विराजमान रहते हैं। वहां जाने से निश्चित व्यक्ति के अनन्त जन्मों के पाप एवं समस्त पुण्य दोनों निशेष हो जाऐंगे। शेष रह जाएगा मात्र प्रेम।


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