श्री गुरु नानक देव जी और सच्चा सौदा

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Monday, November 11, 2013-2:58 PM

श्री गुरु नानक देव जी सिख धर्म के संस्थापक गुरु हैं, जिनका जन्म राय भोए की तलवंडी में 1469 ई. में मेहता कालू जी के घर माता तृप्ता जी की कोख से हुआ। बचपन से ही आप का मन प्रभु की भक्ति में लीन रहता था तथा जरूरतमंद लोगों की मदद करना आपकी आदत बन गई थी। आप जी के  जीवन के बारे में विभिन्न जन्म साखियों में विस्तार से वर्णन किया गया है।

कहा जाता है कि आपको जब पढऩे के लिए पंडित जी के पास भेजा गया तो गुरु जी ने पढऩे की नई विधि पंडित जी को ही सिखा दी। बाद में इस संबंध में गुरु जी ने बाणी की रचना की, जो ‘पट्टी’ के नाम से गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित है। जब गुरु जी के जनेऊ डालने की रस्म की जा रही थी तो आपने पंडित जी से कहा कि मुझे ऐसा जनेऊ पहनाया जाए जो न तो कभी टूट सके तथा न ही गंदा हो सके और न ही अग्नि उसे जला सके। यह सुनकर सभी दंग रह गए और गुरु जी से ही पूछा ऐसा जनेऊ कहां से मिलेगा तो गुरु जी ने उत्तर दिया-

‘‘दया कपाह संतोख सूत जत गंढी सत वट॥
इह जनेऊ जीय का हई त पांडे घत॥
न इह तुटै न मल लगै न इह जलै न जाए॥
धन सु माणस नानका जो गल चल्ले पाए॥’’


इसके बाद जब गुरु जी कुछ और बड़े हुए तो उन्हें कारोबार सिखाने के लिए 20 रुपए देकर कुछ बढिय़ा सामान लाने के लिए भेजा गया ताकि उसे बेचकर कुछ और पैसे कमाए जा सकें, परंतु गुरु जी ने गांव चूहड़काना में कई दिनों से भूखे साधुओं को इन पैसों से भोजन खिलाया तथा कहा कि यह सच्चा सौदा है। जब गुरु जी घर पहुंचे तो उनके पिता जी उन पर बहुत नाराज हुए परंतु गुरु जी की बहन बीबी नानकी जी ने अपने पिता जी को समझाया कि गुरु जी कोई साधारण पुरुष नहीं बल्कि भगवान ने उन्हें किसी विशेष कार्य के लिए भेजा है।

फिर बहन नानकी जी अपने भाई को अपने ससुराल सुल्तानपुर लोधी में ले गईं जहां पर गुरु जी को मोदी खाने में नौकरी मिल गई परंतु गुरु जी का ध्यान यहां भी प्रभु भक्ति में लगा रहता। जो भी जरूरतमंद आप जी के पास आता आप उसे भोजन या राशन दे देते थे। यहीं पर बेईं नदी में एक दिन जब आप स्नान करने गए तो तीन दिन तक गायब रहे। लोगों ने समझा कि गुरु जी नदी में डूब गए हैं परंतु तीसरे दिन जब आप नदी से बाहर निकले तो आपने कहा कि न कोई हिन्दू न मुसलमान। इस पर विवाद खड़ा हो गया परंतु गुरु जी ने सभी को समझाया कि मनुष्य को इंसान बनना है इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। भाई गुरदास जी लिखते हैं-

‘‘बाबा देखे ध्यान धर जलती सभ पृथ्वी दिस आई॥
बाझहु गुरु अंधेर है, है है करती सुनी लोकाई॥’’


जब गुरु जी ने देखा कि दुनिया में बहुत अंधकार फैला हुआ है तथा सत्य का कहीं नामो-निशान न रहा तो गुरु जी धर्म के प्रचार हेतु तथा लोगों को परमात्मा के साथ जोडऩे के लिए घर से चल पड़े। गुरु जी ने चारों दिशाओं में चार लंबी यात्राएं कीं जिन्हें ‘चार उदासियां’ कहा जाता है। इन चार यात्राओं में गुरु जी ने देश-विदेश का भ्रमण किया तथा लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। कौडा राक्षस तथा सज्जन जैसे ठग गुरु जी की प्रेरणा से सत्यवादी बने।

गुरु जी ने पहाड़ों में बैठे योगियों तथा सिद्धों के साथ भी वार्ताएं कीं तथा उन्हें दुनिया में जाकर लोगों को परमात्मा के साथ जोडऩे की प्रेरणा देने के लिए उत्साहित किया। आप जी ने गृहस्थ मार्ग को सर्वोत्तम माना तथा स्वयं भी गृहस्थ जीवन व्यतीत किया। आप जी की शादी पक्खो का रंधावा (गुरदासपुर) के रहने वाले पटवारी मूला चोणा की सुपुत्री सुलक्षणी जी से मूला जी के पैतृक गांव बटाला में हुई। आप जी के दो पुत्र बाबा श्रीचंद तथा बाबा लक्ष्मी दास जी थे।

भाई गुरदास जी के अनुसार गुरु नानक देव जी अपनी यात्राएं (उदासियां)पूरी करने के बाद करतारपुर साहिब आ गए। उन्होंने उदासियों का भेस उतार कर संसारी वस्त्र धारण कर लिया। सत्संग प्रतिदिन होने लगा। भाई गुरदास जी के शब्दों में:-

‘‘ज्ञान गोष्ठ चर्चा सदा अनहद शब्द उठै धुनिकारा॥
सोदर आरती गावीअै अमृत वेलै जाप उचारा॥’’


गुरु जी स्वयं खेतीबाड़ी का काम करने लगे तथा दूर-दूर से लोग गुरु जी के पास धर्म कल्याण के लिए आने लगे। यहां पर भाई लहणा जी गुरु जी के दर्शनों के लिए आए तथा सदैव के लिए गुरु जी के ही होकर रह गए। गुरु जी ने उनकी कई कठिन परीक्षाएं लीं तथा हर तरह से योग्य मानकर उन्हें गुरु गद्दी दे दी तथा उनका नाम गुरु अंगद देव जी रखा। 1539 ई. में आप करतारपुर साहिब में ज्योति जोत समा गए।


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