देवउठनी पर देवों को जगाएं

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Tuesday, November 12, 2013-11:58 AM

देव प्रबोधिनी एकादशी (13 नवंबर) के दिन से चातुर्मास का समापन होकर शुभ मांगलिक कार्यों का प्रारंभ हो जाता है। इस दिन धर्म कर्म के रूप में देवताओं का स्वागत करें।

देव उठनी पर पूजा-विधि
इस दिन सायंकाल शुभ मुहूत्र्त में पूजा स्थल को स्वच्छता के साथ साफ  कर लें तथा चूना एवं गेरू (लाल रंग) से भगवान के जागरण व स्वागत के लिए रंगोली बनाएं। ग्यारह घी के दीपक देवताओं के निमित्त जलाएं। भगवान के भोग में ऋतु फल, लड्डू, पतासे, गुड़, मूली, गन्ना, ग्वार फली, बेर, नवीन धान्य इत्यादि समस्त पूजा सामग्री तथा प्रसाद रखें।

शुद्ध जल, सफेद वस्त्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, पुष्पमाला, अक्षत, रोली, मोली, लौंग, पान, सुपारी, हल्दी, नारियल, कपूर, पंचामृत, इत्यादि पूजा सामग्री से देवताओं का पूजन करें। भगवान विष्णु को चार माह की योग निद्रा से जगाने के लिए घंटा, शंख, मृदंग, नगाड़े आदि वाद्यों की मंगल घ्वनि के बीच ये श्लोक पढ़कर जगाते हैं। फिर मांगलिक गीत गाए जाते हैं।

देव जागरण के बाद मंत्र

‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।’ या गुरु द्वारा प्रदत्त किसी अन्य मंत्र का यथा शक्ति जप करें। श्रीविष्णुसहस्त्रनाम, गोपाल सहस्त्रनाम और श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इसके बाद आरती, पुष्पांजलि करें। देवी-देवताओं से वर्ष पर्यन्त सुख समृद्धि और खुशहाली की कामना करें।


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