योग सम्राज्य की इच्छा रखने वालों को....

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Thursday, November 14, 2013-9:27 AM
 मंदिरों में भगवान की पूजा अर्चना करने के लिए अनेक प्रकार के वाद्य बजाए जाते हैं। वादन बजाना हमारी सनातन परंपरा है। समस्त वाद्यों की अपनी अपनी विशिष्टता है। श्रृंगी नाद आसुरी शक्तियों के मन में भय उत्पन्न करता है। वीणा नाद से योगियों का ब्रहमा से साक्षात्कार होने लगता है। वंशी वादन से इन्द्रियां वश में होने लगती हैं। शंखनाद से विजय की संभावना की जाती है।

नारद जी और सरस्वती माता की वीणा, नाथ संप्रदायों की सांरगी, श्री कृष्ण की मुरली, शंकर जी का डमरू, उर्वशी जी के नूपुर आदि अपने नादों के लिए जानें जाते हैं। यूनानी देवता भी वंशी वादन करते थे जिससे ब्रह्माण्ड हिल जाता था। प्राचीन रोम के चर्च में घंटानाद होते थे। ताण्डव नृत्य के समय शिव के पद घुंधरू बोल उठे थे और लास्य नृत्य के समय पार्वती माता के नूपुर। रासलीला के समय कृष्ण की पैंजनी नाद ब्रहमा की उपासना करती थी। शिव बारात में गणों ने तुरही बजा बजा कर नाद पर नृत्य किया था। दक्षिण भारत के मंदिरों में देव दासियों के नूपुर बजते ही पूजा की घंटीयां बजने लगती थी।

संगीत की उपासना नाद ब्रहमा की उपासना रही है। यूनान की संगीत और नाद शस्त्र की आधिष्ठात्री म्यूज का बोलबाला समस्त यूरोप में था। सामवेद की संस्कृति नाद उपासना रही है। वाद्य से मंदिर के देवता प्रसन्न होते हैं। समाधि के सहायक होने के कारण इन वाद्यों का देव मंदिर में पूजन के समय प्रयोग आरंभ हुआ।

शिव संहिता के अनुसार," नाद के समान दूसरा लय कारक नहीं है। योग सम्राज्य की इच्छा रखने वालों को एकाग्र मन से नाद को सुनना चाहिए।"


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