क्या आप नर से नारायण बनना चाहते हैं ?

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Thursday, November 14, 2013-9:38 AM
महर्षि विश्वामित्र महर्षि बनने से पूर्व पराक्रमी राजा थे। विश्वामित्र की वीरता का डंका तीनों लोकों में बजता था। एक बार विश्वामित्र जंगल में शिकार के लिए गए। शाम के समय वह राह भटक गए। उन्होंने वन में एक आश्रम देखा। सेना को आश्रम की तरफ जानें का आदेश दिया। आश्रम में महर्षि वशिष्ठ अपने शिष्यों के संग निवास करते थे।

विश्वामित्र ने उन्हें जाकर अपना परिचय दिया और कहा," मैं और मेरी सेना बहुत भूखे हैं क्या आप हमारे लिए कुछ खाने पीने का प्रबंध कर सकते हैं?"

महर्षि वशिष्ठ ने उनका खूब आदर सत्कार किया और सभी को पेट भर मन पसंद भोजन करवाया। विश्वामित्र को बहुत हैरानी हुई जंगल में कैसे इतने सारे भोजन का प्रबंध हुआ। विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ से पूछा तो उन्होंने बताया," यह सब हमारी माता का कृपा प्रशाद है।"

विश्वामित्र ने माता से मिलने की जिज्ञासा उत्पन्न की तो उन्होंने बताया हमारे पास एक गाय है। जिसका नाम कामधेनू है वो हमारी समस्त इच्छाओं को पूर्ण करती है। राजा का मन बेईमान हो गया वो वशिष्ठ जी से बोला आप को चाहिए कि," यह गाय राजा को भेंट कर दें।"

वशिष्ठ जी बोले," कोई अपनी माता को भेंट नहीं करता।"

विश्वामित्र को क्रोध आ गया और वो बोला," अगर आप अपनी इच्छा से नहीं देंगे तो हम जबरन लें जाएंगे।"

आश्रम के शिष्य और विश्वामित्र की सेना आपस में भीड़ गए। जब आश्रम के शिष्य हारने के कगार पर आ गए तो वशिष्ठ जी ने गाय माता से रक्षा की प्रार्थना करी। तभी गाय माता के कानों का आकार बढ़ने लगा और उस में से विशाल सेना का आगमन हुआ। उन्होंने विश्वामित्र और उसकी सेना को मार भगाया। अपने महल वापिस आ कर विश्वामित्र ने सभा बुलाई और वशिष्ठ जी के आश्रम पर चढ़ाई करने का आदेश दिया।

एक मंत्री बोला," राजन वशिष्ठ जी ऋषि है उनके तप का तेज बहुत अधिक है।"

विश्वामित्र को बड़ा आचरज हुआ। उन्होंने सोचा अगर एक तपस्वी के तप में इतना बल है तो क्या लाभ इस राज पाठ का। इतना कहकर वह सब कुछ त्याग कर जंगल में निकल गए। तप के बल पर वह ऋषि से महर्षि विश्वामित्र बन गए।

तप के बल पर विश्वामित्र जी के सारे दोषों का निवारण हो गया। गृहस्थ जीवन में भी अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। तप द्वारा उस कष्ट का निवारण संभव है मगर अपने गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को छोड़ कर तप के लिए, पर्वतों, कंदराओ, जंगलो में भटकना तो पाप है। भोग विलासिता में रह कर गृहस्थ जीवन के सारे कर्म करता हुए प्रभु को हर समय स्मरण करें यही गृहस्थ जीवन का तप है। जो कि सबसे बड़ा तप है। संसार की वेदना को मिटाने के लिए तप रूपी औषधि का उपयोग करना होगा। औषधि वही है जो रोग की निवृत्ति कर दे। तप वही है जो नर को नारायण बना दें।


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