कैसे और क्यों पड़े श्री विष्णु के अनेकों नाम ?

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Friday, November 15, 2013-5:05 PM
 गायों की रक्षा करने के कारण भगवान श्री कृष्ण जी का अतिप्रिय नाम 'गोविन्द' पड़ा। कार्तिक, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। आठवें दिन इन्द्र अहंकार रहित होकर भगवान की शरण में आए। कामधेनु ने श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उसी दिन से इनका नाम गोविन्द पड़ा और यही नहीं कृष्ण जी तो समस्त प्राणियों को अपनी माया से आवृत किए रहने और देवताओं के जन्म स्थान होने के कारण वे वासुदेव हैं।

व्यापक तथा महान होने के कारण माधव है। मधु दैत्य का वध होने के कारण उन्हें मधुसूदन कहते हैं। कृष धातु का अर्थ सत्ता है और ण आनंद का वाचक है। इन दोनों भावों से युक्त होने के कारण यदुकुल में अवर्तीण हुए श्री विष्णु कृष्ण कहे जाते हैं। आपका नित्य आलय और अविनाशी परम स्थान हैं इसलिए पुण्डरीकाक्ष कहे जाते हैं। दुष्टों के दमन के कारण जनार्दन है। इनमें कभी सत्व की कमी नहीं होती इसलिए सातत्व हैं।

उपनिषदों से प्रकाशित होने के कारण आप आर्षभ हैं। वेद ही आपके नेत्र हैं इसलिए आप वृषभक्षेण हैं। आप किसी भी उत्पन्न होने वाले प्राणी से उत्पन्न नहीं होते इसलिए अज है। उदर- इंद्रियों के स्वयं प्रकाशक और दाम-उनका दमन करने वाले होने से आप दामोदर है। हृषीक, वृतिसुख और स्वरूपसुख भी कहलाते हैं। ईश होने से आप हृषीकेश कहलाते हैं। अपनी भुजाओं से पृथ्वी और आकाश को धारण करने वाले होने से आप दामोदर है।

अपनी भुजाओं से पृथ्वी और आकाश को धारण करने वाले होने से आप महाबाहु हैं। आप कभी अध: क्षीण नहीं होते इसलिए अधोक्षज है। नरो के अयन यानी आश्रय होने के कारण उन्हें नारायण कहा जाता है। जो सबसे पूर्ण और सबका आश्रय हो उसे पुरुष कहते हैं। आप सत और असत सबकी उत्पति और ल के स्थान हैं तथा सर्वदा उन सबको जानते हैं इसलिए सर्व हैं।

श्री कृष्ण सत्य में प्रतिष्ठित हैं और सत्य से भी सत्य है। वे पूरे विश्व में व्याप्त है इसलिए विष्णु हैं, जय करने के कारण विष्णु हैं। नित्य होने के कारण अनंत हैं और गो इंद्रियो के ज्ञाता होने से गोविंद है।


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