आखिर संत हैं कौन ?

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Friday, November 15, 2013-9:56 AM
संत शब्द का अर्थ है  भक्त, ज्ञानी, विरक्त रसिक साधन आदि। श्री कृष्ण उद्धव जी से कहते हैं कि," मैं भक्तों के पीछे - पीछे  इसलिए चलता हूं कि उनकी पावन चरण रज के संस्पर्श से पवित्र हो जाऊं। संतों की कितनी गरिमा है कितनी महिमा है आखिर संत हैं कौन? इसका उत्तर देते हुए श्री कृष्ण कहते हैं-

1 जो पुरूष आकांक्षा से रहित होकर उपासना में मनोवृति को एकाग्र करने में दक्ष हो, निश्चिन्त रहने वाला संत है।

2 जो न कभी हर्षित होता है न द्वेष करता है, न शोक करता है, न ही किसी प्रकार की कामना करता है, जो शुभ - अशुभ कर्मों का त्याग कर देता है। ऐसा व्यक्ति संत है।

3 जो शत्रु मित्र में, मान - अपमान में सम है, शीत - गर्मी, सुख - दुख द्वन्द्वों में सम है आसक्ति से रहित और दुष्संग से दूर रहता है वह संत है।

4 जो निन्दा स्तुति को समान समझने वाला, मितभाषी, प्रिय - अप्रिय वस्तु की प्राप्ति में भी समरस है, गृह - कुटुम्ब आदि में अनासक्त है वह संत है।

भगवान कपिलदेव जी कहते हैं," आंनद विभोर होकर भक्त गाने, नाचने, रोने लगता है। अन्त करण की शुद्धी तभी होती है जब ह्रदय पिघल जाए, शरीर में रोमांच आ जाए, आंखों से प्रेम की धारा बहने लगे, वाणी गदगद हो जाए।"

एक संत भक्त की रहनी ऐसी है, जिनके पास सेवा का अवसर प्राप्त करने के लिए साकार होकर मुक्ति उपस्थित होती है और संत से निवेदन करती है, मैं आपकी सेवा में आई हूं, मुझे सेवा का अवसर दिजिए। किन्तु उस संत के पास किसी दूसरे से सेवा लेने का समय ही नहीं बचता।


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