शिव प्रिय रुद्राक्ष के रहस्य और महत्व

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Monday, November 18, 2013-10:29 AM

रुद्राक्ष यानि रुद्र+अक्ष, रुद्र अर्थात भगवान शंकर व अक्ष अर्थात आंसू। इस संधि विच्छेद से यह साफ पता चलता है कि इसकी उत्पति भगवान शंकर की आंखों के आंसू से हुई है। मान्यता है की एक समय भगवान शंकर ने संसार के उपकार के लिए सहस्र वर्ष तप किया। तदोपरांत जब उन्होंने अपने नेत्र खोलें तो उनके नेत्र से अश्रु की चन्द बूंदें पृथ्वी पर गिर गई। इन बूंदों ने रुद्राक्ष वृक्ष का रूप धारण किया।


रुद्राक्ष दो जाति के होते हैं- रुद्राक्ष एवं भद्राक्ष। रुद्राक्ष के मध्य में भद्राक्ष धारण करना महान फलदायक होता है-

रुद्राक्षाणांतुभद्राक्ष:स्यान्महाफलम्।


रुद्राक्ष धारण करने से तन-मन में पवित्रता का संचार होता है। जो व्यक्ति पवित्र और शुद्ध मन से भगवान शंकर की आराधना करके रुद्राक्ष धारण करता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से ही पापों का क्षय हो जाता है। जिस घर में रुद्राक्ष की पूजा की जाती है, वहां लक्ष्मी जी का वास रहता है। रुद्राक्ष पापों के बड़े से बड़े समूह को भी भेद देते हैं।

चार वर्णो के अनुरूप ये भी श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण वर्ण के होते हैं। ऋषियों का निर्देश है कि मनुष्य को अपने वर्ण के अनुसार रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। भोग और मोक्ष, दोनों की कामना रखने वाले लोगों को रुद्राक्ष की माला अथवा मनका जरूर पहनना चाहिए। विशेषकर शैवों के लिए तो रुद्राक्ष को धारण करना अनिवार्य ही है।

शास्त्रों में एक से चौदहमुखी तक रुद्राक्षों का वर्णन मिलता है। इनमें एक मुखी रुद्राक्ष सर्वाधिक दुर्लभ एवं सर्वश्रेष्ठ है।


# एकमुखी रुद्राक्ष साक्षात शिव का स्वरूप होने से परब्रह्म का प्रतीक माना गया है। इसका प्राय: अ‌र्द्धचन्द्राकार रूप ही दिखाई देता है। एकदम गोल एकमुखी रुद्राक्ष लगभग अप्राप्य ही है। एकमुखी रुद्राक्ष धारण करने से ब्रह्म हत्या के समान महापात  नष्ट हो जाते हैं। समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जीवन में कभी किसी वस्तु का अभाव नहीं होता है। भोग के साथ मोक्ष प्रदान करने में समर्थ एकमुखी रुद्राक्ष भगवान शंकर की परम कृपा से ही मिलता है।

 # दोमुखी रुद्राक्ष को साक्षात अर्द्धनारीश्वर ही मानें। इसे धारण करने वाला भगवान भोलेनाथ के साथ माता पार्वती की अनुकम्पा का भागी होता है। इसे पहिनने से दाम्पत्य जीवन में मधुरता आती है तथा पति-पत्नी का विवाद शांत हो जाता है। दोमुखी रुद्राक्ष घर-गृहस्थी का सम्पूर्ण सुख प्रदान करता है।

# तीन-मुखी रुद्राक्ष अग्नि का स्वरूप होने से ज्ञान का प्रकाश देता है। इसे धारण करने से बुद्धि का विकास होता है, एकाग्रता और स्मरण-शक्ति बढती है। विद्यार्थियों के लिये यह अत्यन्त उपयोगी है।

# चार-मुखी रुद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्मा जी का प्रतिरूप होने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थो को देने वाला है। नि:संतान व्यक्ति यदि इसे धारण करेंगे तो संतति-प्रतिबन्धक दुर्योग का शमन होगा। कुछ विद्वान चतुर्मुखी रुद्राक्ष को गणेश जी का प्रतिरूप मानते हैं।

 # पांचमुखी रुद्राक्ष पंच देवों-शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य और विष्णु की शक्तियों से सम्पन्न माना गया है। कुछ ग्रन्थों में पंचमुखी रुद्राक्ष के स्वामी कालाग्नि रुद्र बताए गए हैं। सामान्यत: पांच मुख वाला रुद्राक्ष ही उपलब्ध होता है। संसार में ज्यादातर लोगों के पास पांचमुखी रुद्राक्ष ही हैं। इसकी माला पर पंचाक्षर मंत्र (नम:शिवाय) जपने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

 # छह मुखी रुद्राक्ष षण्मुखी कार्तिकेय का स्वरूप होने से शत्रु नाशक सिद्ध हुआ है। इसे धारण करने से आरोग्यता,श्री एवं शक्ति प्राप्त होती है। जिस बालक को जन्मकुण्डली के अनुसार बाल्यकाल में किसी अनिष्ट का खतरा हो, उसे छह मुखी रुद्राक्ष सविधि पहिनाने से उसकी रक्षा अवश्य होगी।

 # सातमुखी रुद्राक्ष कामदेव का स्वरूप होने से सौंदर्यवर्धक है। इसे धारण करने से व्यक्तित्व आकर्षक और सम्मोहक बनता है। कुछ विद्वान सप्तमातृकाओं की सातमुखी रुद्राक्ष की स्वामिनी मानते हैं। इसको पहिनने से दरिद्रता नष्ट होती है और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

# आठ मुखी रुद्राक्ष अष्ट भैरव-स्वरूप होने से जीवन का रक्षक माना गया है। इसे विधिपूर्वक धारण करने से अभिचार कर्मो अर्थात् तान्त्रिक प्रयोगों (जादू-टोने) का प्रभाव समाप्त हो जाता है। धारक पूर्णायु भोगकर सद्गति प्राप्त करता है।

# नौ मुखी रुद्राक्ष नवदुर्गा का प्रतीक होने से असीम शक्ति सम्पन्न है। इसे अपनी भुजा में धारण करने से जगदम्बा का अनुग्रह अवश्य प्राप्त होता है। शाक्तों(देवी के आराधकों) के लिये नौ मुखी रुद्राक्ष भगवती का वरदान ही है। इसे पहिनने वाला नवग्रहों की पीडा से सुरक्षित रहता है।

# दस मुखी रुद्राक्ष साक्षात जनार्दन श्री हरि का स्वरूप होने से समस्त इच्छाओं को पूरा करता है। इसे धारण करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है तथा कष्टों से मुक्ति मिलती है।

 # ग्यारह मुखी रुद्राक्ष एकादश रुद्र स्वरूप होने से तेजस्विता प्रदान करता है। इसे धारण करने वाला कभी पराजित नहीं होता है।

 # बारह मुखी रुद्राक्ष द्वादश आदित्य- स्वरूप होने से धारक व्यक्ति को प्रभावशाली बना देता है। इसे धारण करने से सात जन्मों से चला आ रहा दुर्भाग्य भी दूर हो जाता है और धारक का निश्चय ही भाग्योदय होता है।

# तेरह मुखी रुद्राक्ष विश्वे देवों का स्वरूप होने से अभीष्ट को पूर्ण करने वाला, सुख-सौभाग्य दायक तथा सब प्रकार से कल्याणकारी है। कुछ साधक तेरह मुखी रुद्राक्ष का अधिष्ठाता कामदेव को मानते हैं।

# चौदह मुखी रुद्राक्ष मृत्युंजय का स्वरूप होने से सर्व रोग निवारक सिद्ध हुआ है। इसको धारण करने से असाध्य रोग भी शान्त हो जाते हैं। जन्म-जन्मान्तर के पापों का शमन होता है।

भिन्न-भिन्न संख्या मे पहनी जाने वाली रुद्राक्ष की माला निम्न प्रकार से फल प्रदान करने में सहायक होती है जो इस प्रकार है

1 रुद्राक्ष के सौ मनकों की माला धारण करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2 रुद्राक्ष के एक सौ आठ मनकों को धारण करने से समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। इस माला को धारण करने वाला अपनी पीढ़ियों का उद्घार करता है।

3 रुद्राक्ष के एक सौ चालीस मनकों की माला धारण करने से साहस,पराक्रम और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

4 रुद्राक्ष के बत्तीस दानों की माला धारण करने से धन, संपत्ति एवं आयु में वृद्धि होती है।

5 रुद्राक्ष के 26 मनकों की माला को सर पर धारण करना चाहिए।

6 रुद्राक्ष के 50 दानों की माला कंठ में धारण करना शुभ होता है।

7 रुद्राक्ष के पंद्रह मनकों की माला मंत्र जप तंत्र सिद्धि जैसे कार्यों के लिए उपयोगी होती है।

8 रुद्राक्ष के सोलह मनकों की माला को हाथों में धारण करना चाहिए।

9 रुद्राक्ष के बारह दानों को मणि बंध में धारण करना शुभदायक होता है।

10 रुद्राक्ष के 108, 50 और 27 दानों की माला धारण करने या जाप करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।


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