तन को धोया मगर मन को धोया नहीं, फिर गंगा नहाने से क्या फायदा

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Monday, November 18, 2013-11:43 AM

गंगा की पूजा इसलिए नहीं करते कि हमने जीवन में बहुत से पाप किए हैं और अपने पापों को धोने के लिए हम गंगा में डुबकी लगा लें। इससे अगर मुक्ति मिलती तो पहले मछलियों को मिलती। वे निरंतर गंगा के पानी में तैरती रहती हैं। गंगा के अंदर स्नान करने का मतलब है गंगा को आत्मसात करना। गंगा की पवित्र भावना को अपने अंदर लाना। अपने जीवन के अंदर उस कर्म को लाना कि हम भी कर्म करके उसको बदल सकते हैं जो कलिकाल आ गया।

हम भी कर्म करके उस कलिकाल को समाप्त करके अपने जीवन को स्वर्गमय बना सकते हैं। अपने जीवन को नरक और स्वर्ग बनाना, अपने जीवन के अंदर कांटे बोना या अपने जीवन में फूल खिला देने की क्षमता आपकी है। आप अपने जीवन को चाहे नरक बना दें या स्वर्ग बना दें। आप चाहें तो अपने जीवन के अंदर अहंकार भर दें या स्वर्ग लें आएं। यह निर्णय करने की क्षमता आपकी अपनी है।

हम जो गंगा मईया की पूजा करते हैं वो इसलिए करते हैं कि हम कर्मयोगी बनें। गंगा मईया के सामने जातक संकल्प लेते हैं कि," मैं अपनी बुराई त्याग दूंगा।"

पर क्या वास्तव में वह अपने संकल्प पर उर्तीण हो पाते हैं। गंगा मईया भारत की जीवन रेखा हैं। गंगा की पवित्रता के विषय में तो सदियों से लोग दैवीय आस्थाएं बनाएं हुए हैं। उसमें स्नान करना तो दूर, केवल दर्शन मात्र से ही पाप नाश व मोक्ष की परिकल्पना की जाती है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं।

गंगा नहाने हरिद्वार काशी गया, गंगा नहाते ही मन में ख्याल आ गया ।
तन को धोया मगर मन को धोया नहीं फिर गंगा नहाने से क्या फायदा ॥


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