...तो निश्चित रूप से आपके भी अच्छे दिन आएंगे

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Tuesday, November 19, 2013-8:38 AM
 एक श्रमिक पत्थर काटते काटते थक गया। आर्थिक अभावों से घिरा वह सोचने लगा कि मैं किस बड़े मालिक का आश्रय ग्रहण करूं जिससे लाभ भी अधिक मिले और मेहनत भी कम करनी पड़े। सोचते - सोचते वह एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ने लगा। शिखर पर चढ़कर देवों से प्रार्थना करने लगा। जब उन्होंने प्रार्थना न सुनी तो विचार करने लगा कि बड़ा कौन है ?

विचार करने पर उसे सूर्य ही समस्त देवों में बड़े देव प्रतीत हुए। वह भगवान सूर्य की आराधना करने लगा। बादल आए और सूर्य को अपने आंचल में समा लिया। श्रमिक फिर से विचार करने लगा कि सूर्य से बड़ा तो बादल है क्योंकि उसने एक ही झटके में सूर्य देव को अपनी ओट में समा लिया। उसने अपना इष्ट बदला और बादलों की प्रार्थना करने लगा।

फिर सोचा यह बादल तो पहाड़ से टकराते हैं और वहां जाकर समाप्त हो जाते हैं। बादल कभी भी अपने वेग से किसी भी पहाड़ को आगे से नहीं हटा पाते इसलिए पहाड़ ही सबसे उत्तम व बड़े हैं। अत: पहाड़ की प्रार्थना ही क्यों न करें ? बाद में सूझा कि पहाड़ को तो रोज हम ही काटते हैं। फिर पहाड़ कैसे बड़ा हुआ ? इसका मतलब है कि हमें अपने आपको ही बड़ा मानना चाहिेए और वास्तव में हम ही बड़े हैं।

इसका यह ही निष्कर्ष है कि व्यक्ति दूसरों की तुलना में स्वयं का आकलन करे तो वह किसी से न तो कम है न छोटा है। जब व्यक्ति अपना आकलन न करके दूसरों की तरफ देखता है तो या तो वे बड़े नजर आते हैं या वह उन्हें तुच्छ समझने की भूल करता है। यह दोंनो ही स्थितियां ठीक नहीं है। इसी कारण से व्यक्ति के मन में हमेशा असंतुष्टी समाई रहती है।

इसके बाद वह सब कुछ छोड़कर गंभीर चिंतन में डूब गया। उसे लगा कि यदि व्यक्ति अपना कार्य ठीक प्रकार से करे, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करे और धैर्य बनाए रखे तो निश्चित रूप से उसके भी अच्छे दिन आएंगे। कुछ दिन बाद वह पुरूषार्थ के सहारे उस क्षेत्र में बड़ों में गिना जाने लगा।

 

 


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