गृह दोषों को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है

  • गृह दोषों को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है
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Tuesday, November 19, 2013-9:01 AM
वास्तु शास्त्र में दिशाओं का बहुत महत्व होता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार आठ दिशाएं न केवल पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति और अदृश्य उर्जा रेखाओं का प्रतिनिधित्व करती है बल्कि पंच तत्वों का केन्द्र भी हैं जैसे उत्तर दिशा में पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से चुंबकीय शक्ति निकलती है। अतः भवन के इस चुंबकीय क्षेत्र में खुला बरामदा रखने, भूमि एवं भवन का स्तर नीचा रखना बताया गया है। भू वैज्ञानिक भी इस सिद्धांत पर सहमति जताते हैं कि इस प्रकार की संरचना से भूमि और भवन के वाष्प स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है।

वास्तु के इस प्रारंभिक ज्ञान के बाद ‘अष्टदिशा वास्तु’ का ज्ञान होना भी जन साधारण के लिए अति आवश्यक है। इस प्रकार दिशाओं के अनुरूप गृह निर्माण करवाने से घर में वास्तु दोष होने का कोई कारण नजर नहीं आता। फिर भी शहरों में स्थानाभाव के कारण छोटे-छोटे भूखंडों पर घर बनाने पड़ते हैं साथ ही शहरों में अधिक संख्या में लोग फ्लैट्स में ही रहते हैं।

जो पहले से ही निर्मित होते हैं अतः घर पूर्णतया वास्तु सम्मत हो, ऐसा संभव नहीं हो पाता। चाहकर भी हम उन वास्तु दोषों को दूर नहीं कर पाते हैं और हमें उसी प्रकार उन वास्तु दोषों को स्वीकार करते हुए अपने घर में रहना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में वास्तु शास्त्रीयों के दिए निर्देशों को अपनाकर गृह दोषों को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है।


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