अस्थि पिंजर से भी होती है ध्वनि

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Saturday, November 23, 2013-8:17 AM
भक्त नामदेव यात्रा पर गए हुए थे। लौटने पर उन्हें पता लगा कि भवन का र्निमाण करते समय दीवार के गिर जाने से संत चोखामेला दीवार के नीचे दबकर गोलोक धाम सिधार गए। नामदेव जी को बहुत दुख हुआ उन्होंने निश्चय किया कि उनके मृतक शरीर को निकालकर चन्द्रभागा नदी में प्रवाहित करेंगे।

कुछ सहयोगियों की सहायता से उन्होंने मलबे की मिट्टी हटानी शुरू की। बहुत प्रयास के उपरांत उन्हें चार अस्थि पिंजर मिले। अब समस्या खड़ी हो गई की संत चोखामेला का कौन सा अस्थि पिंजर होगा। नामदेव जी प्रत्येक कंकाल के समीप गए और कान लगा - लगा कर कुछ सुनने का प्रयास करने लगे। कुछ समय उपरांत बोले," यह ही है संत चोखामेला जी का कंकाल।"

वहां खड़े एक सज्जन ने पूछा, "आप इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकते हैं कि यह संत चोखामेला जी का ही कंकाल है।"

नामदेव जी बोले," जिसे विश्वास नहीं वह कंकाल के समीप आ कर इस अस्थि पिंजर के साथ अपने कान लगाकर सुनें।"

कौतूहलवश बहुत से सज्जन संत चोखामेला जी के अस्थि पिंजर के साथ अपने कान लगाकर सुनने लगे। प्रत्येक अस्थि पिंजर से आवाज आ रही थी हरि ! विट्ठल हरि हरि! हरि! विट्ठल हरि हरि वहां खड़े सज्जन बहुत हैरान हुए किसी के अस्थि पिंजर से हरि ! विट्ठल हरि हरि! हरि! की ध्वनि कैसे सुन सकती है ? उन्होंने जिज्ञासा वश संत नामदेव जी से प्रश्न किया ऐसे कैसे हो रहा है?

नामदेव जी बोले,"ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि संत चोखामेला जी नामरस में इतना सराबोर हो गए कि उनकी हड्डियों में भी रम गया हरि ! विट्ठल हरि हरि! हरि!"

हरि ! विट्ठल हरि हरि ! हरि! में कितनी शक्ति, शांति, सुख, आनंद और रस है। किसी भी लेखनी या वाणी की सामर्थ्य नहीं कि उसे बतला सके।

 


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