दुकान आफिस में रहते हुए कैसे करें साधना

  • दुकान आफिस में रहते हुए कैसे करें साधना
You Are HereDharm
Tuesday, November 26, 2013-1:38 PM
 
 

 

जीवन को सरस व सरल बनाने के लिए साधना करने की जरूरत है। अशिक्षित वर्ग कहता है कि यदि वह पढ़ा लिखा होता तो ग्रन्थ आदि पढ़ कर साधना कर सकता था दूसरी ओर व्यापारी वर्ग यह कहता है कि समय के अभाव के कारण वह साधना नहीं कर सकता। यह जीव का भ्रम है और इस भ्रम को संत एवं गुरूजनों के दिए प्रसाद ने समाप्त कर दिया है। यदि युद्ध के मैदान में अशांत अर्जुन ज्ञान को प्राप्त कर सकता है तो जीव दुकान आफिस में रहते हुए साधना क्यों नहीं कर सकता। ऐसा संत एवं गुरूजनों का मत है और इसके लिए उन्होंने बहुत सरल उपाय भी बताए हैं। वह सावधानी ही साधना है। सावधानी कहां कहां करें

1 दैनिक व्यवहार में

2 भोजन करते समय

3 वस्त्र पहनते समय

4 संग्रह करते समय

5 अतिथि सत्कार के प्रति

6 अपने दैनिक कार्य के प्रति इत्यादि

जीव को चाहिए कि वह किसी से कटु भाषा में व्यवहार न करें। जहां एक ओर दो मीठे शब्द दुश्मन को मित्र का व्यवहार करने के लिए मजबूर कर देते हैं, वहां दूसरी ओर दो कटु शब्द बड़े से बड़ा महाभारत खड़ा कर देते हैं। यदि कोई भूखा मिल जाए तो उसका पूरा न सही आधा पेट ही भर दो। किसी को वस्त्र की आवश्यकता हो तो उसे अपनी हैसियत के अनुसार जरूरत को पूरा करो।

आवश्यकता से अधिक धन हो तो जरूरत मंद की सहायता करो। भारतीय संस्कृति में अतिथि को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है। चाहे कोई दुश्मन ही क्यों न हो घर पर आ जाए तो उसे ईश्वर मान उसका आदर सत्कार करो। अपने दैनिक कार्य के प्रति सजग रहो उतना कमाओ जितनी जरूरत हो।

संत एवं गुरूजनों के बताए मार्ग पर चलकर जीवन में मुक्ति व सुख शांति की प्राप्ति हो सकती है।


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You