हमारा अपना घर कौन सा है

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Tuesday, November 26, 2013-1:41 PM
 
 
 

ये संसार रूपी कारागार आपका हमेशा रहने का स्थान नहीं है। श्री मद भगवद् गीता में भगवान ने स्वयं इस संसार को नाम दिया दुखालय यानि दुखों का घर इसलिए हमें अपने घर में वापिस जाना है। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु- मोक्ष तक के काल क्रम में विभिन्न प्रकार के दुखों का भोग करता है। साथ ही अपने निकटतम को भी दुखी करता है। अत: इस काल क्रम में श्री गोविन्द का भजन ही सुख और शाति का सरल माध्यम है।

हमारा अपना घर कौन सा है

वो है भगवान का धाम

जहां सुख ही सुख है दुख नाम की कोई वस्तु नहीं है। इसे बताने के लिए ही साधु महात्मा गांव गांव में शहर शहर में जाकर आम जन मानस को बताते हैं कि, तुम्हारे दुखों का कारण है कि तुमने अपने पिता, जो अनन्य कोटी ब्रह्माण्डों के मालिक हैं को भुला दिया है। भगवान को भुलाने के कारण ही भगवान की माया तुम्हें कष्ट दे रही है। अब तुम अपने पिता की सेवा करो, भगवान की तरफ उन्मुख हो जाओ उनका भजन करो।

साधु कल्पवृक्ष की तरह केवल देते हैं। साधु लोग एकांत में रहकर भगवान का भजन कर सकते हैं लेकिन जब वह देख रहें हैं कि सारी दुनियां के प्राणी तड़प रहे हैं तो उनका दिल दुखता है और वह गांव - गांव में शहर - शहर में जा जाकर जीवों को समझाते हैं कि तुम तो आनंद की संतान हो तुम्हें तो दुखी होने का कोई कारण ही नहीं है। इस प्रकार साधु लोग जीवों को भगवान के उन्मुख करा देते हैं व उन्हें भगवान के पास ले जाते हैं।

हमारा नश्वर शरीर मिथ्या के सिवाय कुछ नहीं है आवश्यकता है तो सिर्फ अपनी आत्मा को जगाने की। स्वयं को भूल कर उसे विश्वात्मा से मिलाओ। अपने सच्चे स्वरूप को पहचानो। तुम सत्-चित्-आनंद हो। गीता में दो ही बातें प्रमुख है पहला तो कर्म ही पूजा व प्रधान है और दूसरा आत्मा अमर है अर्थात् जिस प्रकार आत्मा अमर है उसी प्रकार जिव्हा से निकले हुए शब्द अमर है जो ब्रह्माण्ड में सदैव टकराते रहते हैं।

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