ऐसा सोचना रावण के लिए भी भारी पड़ गया था

  • ऐसा सोचना रावण के लिए भी भारी पड़ गया था
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Thursday, November 28, 2013-8:19 AM

 

हमारा मन लज्जत का आशिक है। जब तक इसको दुनियां के मोह और प्यार से ऊंचा नीर्मल आनंद और प्यार नहीं मिलता, यह कभी भी दुनियां का मोह, दुनिया का प्यार छोड़ने को तैयार नहीं होता। हम जबरदस्ती मन को दुनियां से निकालने की कोशिश करते हैं, यह आगे जाकर कहीं जुड़ता नहीं वापिस दुनियां में ही भटकना शुरू कर देता है।

जहां विशुद्ध प्रेम, सुख, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और शांति है। सम्पूर्ण प्रकृति भी तब हमारे लिये सुखदायी हो जाती है। इस स्थिति को केवल अनुभव किया जा सकता है यह स्थूल नहीं है अति सूक्ष्म है परम की अनुभूति अंतर को अनंत सुख से ओत प्रोत कर देती है और परम तक ले जाने वाला कोई सदगुरु ही हो सकता है।

जो सारे ब्रह्मांडों को धारण कर रहा है वह धर्म है सच्चिदानंद धर्म। जो सत् है, चेतन है, आनंदस्वरूप है, उसकी ओर चलना धर्म है। जो असत् है, जड़ है, दुःख रूप है उसकी तरफ चलना अधर्म है। आप सत् हैं, शरीर असत् है। शरीर को ʹमैंʹ मानना और ʹसदाʹ बना रहूं। ऐसा सोचना रावण के लिए भी भारी पड़ गया था तो दूसरों की क्या बात है। शरीर कैसा भी मिले पर छूट जाएगा लेकिन मैं अपने-आप से नहीं छूटता है ऐसा ज्ञान सदगुरु ही देंगे।

सर्व भाव से उस सच्चिदानंद की शरण में जाने की विधि वही सिखाते हैं। हम देह नहीं हैं, देही हैं, जिसे शास्त्रों में जीव कहते हैं। जीव परमात्मा का अंश है, उसके लक्षण भी वही हैं जो परमात्मा के हैं। वह भी शाश्वत, चेतन तथा आनन्दस्वरूप है।

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