श्री कृष्ण को प्रसन्न करने का सरल मार्ग ...

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Saturday, November 30, 2013-10:16 AM
 

मुकुन्द दत्त एक भगवत पार्षद हैं। उनके संबंध में महाप्रभु जी कहते हैं, "वह केवल लीलामात्र हैं।"

अत उनके कथन का कोई न कोई अतिशय गूढ़ रहस्य है। उनका गूढ़ उपदेश यह है कि केवल दीक्षा आदि ग्रहण कर भक्त्यांगों का अनुष्ठान करने से ही श्री कृष्ण प्रसन्न नहीं होते। जिनकी अनन्य भक्ति के प्रति अनन्य श्रद्धा उत्पन्न हो गई है वे ही प्रभु को संतुष्ट कर सकते हैं। वे शुद्ध भक्ति का पक्ष दृढ़ता से ग्रहण कर सकते हैं।

जहां शुद्ध भक्ति का कोई प्रसंग नहीं होता, वहां वे नहीं जाते, वहां वे उठते बैठते भी नहीं। जहां शुद्ध भक्ति का प्रसंग चलता है वहीं पर वे रूचिपूर्वक बैठते हैं तथा उसका श्रवण करते हैं। सरलता, शुद्धता, दृढ़ता और ऐकान्तिकता ही शुद्ध भक्तों का स्वभाव होता है। वे लोक रंजन के लिए कभी भी भक्ति विरूद्ध बातों या कार्यों का अनुमोदन नहीं करते। शुद्ध भक्तजन सर्वदा निरपेक्ष रहते हैं।

श्रीकृष्ण का जीवन सर्वांगसंपूर्ण जीवन है। उनकी हर लीला कुछ नयी प्रेरणा देने वाली है। उनकी जीवन-लीलाओं का वास्तविक रहस्य तो श्रीकृष्ण तत्त्व का आत्मरूप से अनुभव किए हुए महापुरूष ही हमें समझा सकते हैं। ईश्वर कर्मबन्धन से नहीं, माया के वश नहीं अपितु माया को वश करता हुआ संसार में जीवों की नाईं ही आता है, जीता है। श्रीकृष्ण तुम्हें यह बताना चाहते हैं कि माया को माया समझो और चैतन्य स्वरूप को 'मैं' रूप में जान लो तो माया को भी मजा है और अपने आपको भी मजा ही मजा है।

तमोगुण से रजोगुण में आएं और रजोगुण के बाद सत्त्वगुण में पहुंचे और सत्त्वगुणी आदमी गुणातीत हो जाए। प्रकृति में युद्ध की व्यवस्था भी है, प्रेम की व्यवस्था भी है और साहस की व्यवस्था भी है। आपका सर्वांगीण विकास हो इसलिए काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा दुर्बलताओं से युद्ध करो। अपने चैतन्य आत्मा को परमात्मा से एकाकार कर दो।

कुंता जी कहती हैं,"हे भगवान ! संसार के कुचक्र में बारम्बार जन्म, मृत्यु और वासना के वेग में बह जाने वाले जीवों को निर्वासनिक तत्त्व का प्रसाद दिलाने के लिए लीला-माधुर्य, रूप-माधुर्य और उपदेश-माधुर्य से जीव का अपना निज स्वरूप जो कि परम मधुर है, सुख स्वरूप है उस सुख स्वरूप का ज्ञान कराने के लिए, आत्म-प्रसाद देने के लिए और कामनाओं के कुचक्र से संसार समुद्र में बह जाने वाले जीवों को तारने के लिए आपका अवतार हुआ है।"


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