क्या है इस कुंज का राज़

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Saturday, December 07, 2013-10:47 AM

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष पंचमी को वृन्दावन बिहारी श्री बांके बिहारी जी का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। इसी दिन अप्रकट रहने वाले प्रभु साक्षात् नित्य वृन्दावन में निधिवन में प्रकट हो गए थे। तीनों लोको के स्वामी को इस दिन रसिक सम्राट स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ने जीत लिया था और वो अपने सभी भक्तों को दर्शन देने के लिए उनके सामने आ गए थे।

स्वामी श्री हरिदास जी निधिवन के कुंजो में प्रतिदिन नित्य रास और नित्य विहार का दर्शन किया करते थे और अत्यंत सुंदर पद गया करते थे। वो कोई साधारण मनुष्य नहीं थे बल्कि भगवान कि प्रमुख सखी श्री ललिता सखी जी के अवतार थे।  जब तक वो धरती पर रहे, उन्होंने नित्य रास में भाग लिया और प्रभु के साथ अपनी नजदीकियों का हमेशा आनंद उन्हें प्राप्त हुआ।

उनके दो प्रमुख शिष्य थे। सबसे पहले थे उनके अनुज गोस्वामी जगन्नाथ जी जिनको स्वामी जी ने ठाकुर जी की सेवा के अधिकार दिए और आज भी वृन्दावन में बांके बिहारी मंदिर के सभी गोस्वामी जगन्नाथ जी के ही कुल के हैं। उनके दूसरे शिष्य थे उनके भतीजे श्री विठ्ठल विपुल देव जी। बिहार पंचमी के दिन विठ्ठल विपुल देव जी का जन्मदिन भी होता है।

स्वामी जी के सब शिष्य उनसे रोज आग्रह किया करते थे कि वो खुद तो रोज नित्य विहार का आनंद उठाते है कभी उन्हें भी यह सौभाग्य दें।  जिससे वो भी इस नित्य रास का हिस्सा बन सके पर स्वामी जी ने कहा की सही समय आने पर उन्हें स्वतः ही इस रास का दर्शन हो जायेगा क्योंकि रास का कभी भी वर्णन नहीं किया जा सकता।  इसका तो केवल दर्शन ही किया जा सकता है और वो दर्शन आपको भगवान के आलावा कोई नहीं करा सकता।

स्वामी जी का एक कुञ्ज था जहां वो रोज साधना किया करते थे। उनके सभी शिष्य इस बात को जानने के लिए काफी व्याकुल थे कि ऐसा क्या खास है उस कुञ्ज में।  एक दिन जिस दिन विठ्ठल विपुल देव जी का जन्मदिन था, स्वामी जी ने सबको उस कुंज में बुलाया।  जब सब विठ्ठल विपुल देव जी के साथ उस कुञ्ज में गए तो सब एक दिव्या प्रकाश से अंधे हो गए और कुछ नज़र नहीं आया।

फ़िर स्वामी जी सबको अपने साथ वहां लेकर आए और सबको बिठाया। स्वामी जी प्रभु का स्मरण कर रहे थे, उनके सभी शिष्य उन का अनुसरण कर रहे थे और सबकी नज़रे उस कुञ्ज पर अटकी हुई थी और सब देखना चाहते थे कि क्या है इस कुञ्ज का राज़ तो सबके साथ स्वामी जी यह पद गाने लगे

 माई री सहज जोरी प्रगट भई जू रंग कि गौर श्याम घन दामिनी जैसे प्रथम हूं हुती अब हूं आगे हूं रही है न तरिहहिं जैसें अंग अंग कि उजराई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसें श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी सम वस् वैसें

चेहरे पे मंद मंद मुस्कान, घुंघराले केश, हाथों में मुरली, पीताम्बर धारण किए हुआ जब प्रभु कि उस मूरत का दर्शन सब ने किया तो सबका क्या हाल हुआ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।  वे अपनी पलक झपकाना भी भूल गए और ऐसे बैठे हुए हैं मानो कोई शरीर नहीं बल्कि एक मूर्ति हैं।

स्वामी जी कहते है कि देखो प्रभु प्रकट हो गए हैं।  प्रभु कि शोभा ऐसी ही है जैसी घनघोर घटा कि होती है। यह युगल जोड़ी हमेशा विद्यमान रहती है।  प्रकृति के कण कण में युगल सरकार विराजमान हैं और ये हमेशा किशोर अवस्था में ही रहते हैं। स्वामी जी के आग्रह से प्रिय और प्रीतम एक दूसरे के अंदर लीन हो गए और फ़िर वही धरती से स्वामी जी को एक दिव्या विग्रह प्राप्त हुआ जिसमें राधा और कृष्ण दोनों का रूप है और इसी विग्रह के माध्यम से ठाकुर जी हमें श्री धाम वृन्दावन में दर्शन देते हैं। यही कारण है कि ठाकुर जी का आधा श्रृंगार पुरुष का होता है और आधा श्रृंगार स्त्री का होता है।

यह त्यौहार श्री धाम वृन्दावन में आज भी बहुत धूम धाम से मनाया जाता है।  सुबह सबसे पहले निधिवन में प्रभु के प्राकट्य स्थल में जो भगवन में प्रतीक चरण चिन्ह है उनका पंचामृत अभिषेक किया जाता है। फिर एक विशाल सवारी स्वामी जी की वृन्दावन के प्रमुख बाजारों से होती हुई ठाकुर जी के मंदिर में पहुंचती हैं।  स्वामी जी कि सवारी में हाथी, घोड़े, कीर्तन मंडली इत्यादि सब भाग लेते हैं।

सवारी के सबसे आगे तीन रथ चलते हैं। इनमें से एक रथ में स्वामी श्री हरिदास जी, एक में गोस्वामी जगन्नाथ जी और एक रथ में विठ्ठल विपुल देव जी के चित्र विराजमान होते हैं। ये रथ रज भोग के समय ठाकुर जी के मंदिर में पहुंचते है और फ़िर तीनों रसिकों के चित्र मंदिर के अंदर ले जाए जाते हैं।  ऐसा माना जाता है कि इस दिन ठाकुर जी हरिदास जी महाराज कि गोद में बैठकर उनके हाथों से भोग लगाते हैं।

यदि आपको किशोरी जी इस दिन अपने धाम वृन्दावन में बुला लें तो आपका सौभाग्य है परन्तु यदि किशोरी जी नहीं भी बुलाती हैं तो मै आप सब से आग्रह करूंगा कि सुबह आप अपने घर पे ही बिहारी जी को भोग लगाए और संध्या के समय प्रभु की आरती करिए और उनके भजन में झूमते रहिए। आप पर कृपा ज़रूर बरसेगी और आपको यह जानकार बहुत खुशी होगी कि इसी दिन भगवान श्री राम का जानकी जी के साथ विवाह भी हुआ था इसलिए बिहार पंचमी को विवाह पंचमी भी कहा जाता है।


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