सोमवार को शि‍व जी की शिवाराधना करने से....

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Monday, December 09, 2013-7:33 AM
भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल है। वे कल्याण की जन्मभूमि तथा परम कल्याणमय है। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही है। ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया शक्ति में भगवान शिव के जैसा कोई नहीं है। वे सभी मूल के कारण रक्षक पालक तथा नियन्ता होने के कारण महेश्वर कहे जाते हैं। उनका आदि और अनंत न होने से वे अनंत है। वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के संपूर्ण दोषों को भी क्षमा कर देते हैं।

भगवान शिव शंकर का परिवार भी बहुत व्यापक है। एकादश रूद्र, रूद्राणियां, चौंसठ योगिनियां, षोडश मातृकाएं, भैरव आदि इनके सहचर तथा सहचरी हैं। गणपति परिवार में उनकी पत्नी ऋद्धी सिद्धि तथा दो पुत्र शुभ लाभ हैं। उनका वाहन मूषक है। कार्तिकेय की पत्नि देवसना तथा वाहन मयूर है। भगवती पार्वती का वाहन सिंह है और स्वयं शिव जी नंदी पर सवार रहते हैं।

स्कंदपुराण के अनुसार, एक बार भगवान धर्म की ईच्छा हुई की वह शिव जी का वाहन बनें। इसके लिए उन्होंने दीर्घकाल तक तपस्या की। अंत में शिव जी ने उन पर अनुग्रह किया और उन्हें अपने वाहन के रूप में स्वीकार किया। बाण, रावण, चण्डी, भृंगी आदिशिव के मुख्य पार्षद हैं। इनके द्वारा रक्षक के रूप में र्कीर्तिमुख प्रसिद्ध हैं। इनकी पूजा के उपरांत ही शिव मंदिर में प्रवेश करके पूजा करने का विधान है। इससे भगवान शिव बहुत प्रसन्न होते हैं।

सोमवार भगवान शंकर का प्रिय दिन है। इस दिन सोमवार को शि‍व जी की शिवाराधना करना चाहिए। सुहागन स्त्रियों को इस दिन व्रत रखने से अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है। विद्यार्थियों को सोमवार का व्रत रखने से और शिव मंदिर में जलाभिषेक करने से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है। बेरोजगार और अकर्मण्य जातकों को रोजगार और काम मिलने से मान प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। सदगृहस्थ नौकरी पेशा या व्यापारी को सोमवार व्रत करने से धन धान्य और लक्ष्मी की वृद्धि होती है। 'ॐ नम: शिवाय:' का उच्चारण करने से ही भगवान शिव मनवांछित फल देते हैं।


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