इस तीर्थ में तर्पणादि करने से नरमेघ यज्ञ का पुण्य मिलता है

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Thursday, December 12, 2013-8:04 AM

अष्टावक्र जी के पिता ने अपने पुत्र का विवाह वदान्य ऋषि की कन्या से करने के लिए वदान्य ऋषि से आग्रह किया। वदान्य ऋषि बोले, " हमारी दो शर्तें हैं। आपका पुत्र कैलाश जाकर शिव जी के दर्शन करें और कुबेर की महफिल में जाकर रहे। अगर आपके पुत्र ब्रह्मचारी रहे तो दूसरी एक शर्त पर उन्हें सफल होना पड़ेगा।"

अष्टावक्र जी बोले," दूसरी शर्त क्या है।"

वदान्य ऋषि बोले," हेमकूट पर्वत पर एक सुहावना आश्रम है। उस आश्रम में योगिनियां रहती हैं। जो बहुत ही आकर्षक हैं। उनके यहां अष्टावक्र कुछ समय के लिए अतिथि बन कर रहें फिर भी उनका ब्रह्मचार्य अखण्ड रहा तो मैं अपनी कन्या अष्टावक्र जी को दान कर दूंगा।"

अष्टावक्र जी को जब ज्ञात हुआ तो वे कैलाश पर्वत की ओर चल पड़े। कुबेर जी उनकी अगवानी करने आए। अष्टावक्र जी उनके अतिथि बन कर बहुत समय तक वहां रहे। बाद में उन्होंने आगे की यात्रा करी। महिलाओं के सुंदर आश्रम में योगिनियों को बाहर से आवाज लगाई," इस एकांत शांत स्थान में अगर कोई रहता है तो मैं अष्टावक्र अतिथि के रूप में आया हूं। मुझे अपने आश्रय का अतिथि बनाएं।"

बहुत बार दोहराने के उपरांत सात कन्याएं जो कि अप्सराएं लगती थी बाहर आई और उन्हे अंदर ले गई। उनका खूब आदर सत्कार करने के उपरांत हास्य विलास और इन्द्रियों में उत्तेजना पैदा करें ऐसा वातावरण उन्होंने तैयार किया। उन सात कुमारिकओं ने अष्टावक्र जी को भोजन करवाया। उस आश्रम की अधिष्ठात्री महिला ने भी कह रखा था कि मुनि आत्मवेता है। जितनी हो सके उनकी सेवा करो।

 रात्रि में एक सुंदर विशाल खण्ड सजाया गया। जब मुनि को नींद आने लगी तो वो बोले, बहनों तुम जाकर विश्राम करो। मुझे नींद आ रही है। अगर स्थान का अभाव हो तो अधिष्ठात्री माता यहां विश्राम कर सकती हैं। मुनि निद्राग्रस्त हुए। मध्य रात्रि को अधिष्ठात्री देवी आई और मुनि के बिस्तर में सो गई। उन्हें रिझाने के प्रयत्न करने लगी। जब उस महिला ने थोड़ी अतिशयता की तब मुनि ने आंखे खोली और बोले, "माता मुझे कब से अपनी गोद में खिला रही हो मेरी नींद टूट गई है।"

अधिष्ठात्री महिला बोली, "माता ! माता ! क्या करते हो। मैं तुम्हारा सौंदर्य देखकर काम से पीड़ित हो रही हूं। मेरी इच्छा पूर्ण करो।"

मुनि बोले, "उन बच्चियों को मैंने बहन माना है और आपको माता। मुझको आशिर्वाद दो मैं वदान्य ऋषि की परीक्षा में सफल हो सकूं।"

अधिष्ठात्री महिला ने उन्हें फिसलाने का बहुत प्रयास किया परंतु उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। आखिर उस महिला ने अपना असली रूप प्रकट किया और कहा," मैं साधारण महिला नहीं हूं। मैं उत्तर दिशा की अधिष्ठात्री हूं। यह सभी मेरी परिचारिकाएं हैं। मुनि तुम धन्य हो।" 

अष्टावक्र घर लौट आए और नियमानुकुल विवाह कर गृहस्थाश्रम में समय बिताने लगे। अष्टावक्र जी के इन्द्रिय विजय होने से ही उनके तीर्थ में तर्पणादि करने से नरमेघ यज्ञ का पुण्य होता है।


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