भक्त का अपमान करने का परिणाम

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Tuesday, December 17, 2013-1:29 PM

राम चन्द्र जी अपने दरबार में अकेले बैठे थे और हनुमान जी हाथ जोड़ कर उनकी आज्ञा का इंतजार कर रहे थे। राम जी हनुमान जी से बोले, " हनुमान तुम मुझे बहुत प्यारे हो। यहां तक की राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुध्न से भी अधिक।"

हनुमान जी राम जी का प्रत्येक कार्य स्वयं करते। उनके कुछ भी कहने से पूर्व वह सब समझ जाते। उनके इस प्रकार के सेवा भाव से लक्ष्मण, भरत, शत्रुध्न और जानकी जी वंचित रह जाते। सभी ने मिल कर गुप्त मंत्रणा की और आपस में विचार विमर्श करके सभी कार्य आपस में बांट लिए।

अगले दिन सुबह जब राम जी जगे तो हनुमान जी पादुका लेकर उनकी सेवा में जाने लगे तो लक्ष्मण जी ने उन्हें धकेल कर स्वयं पादुका ली और राम जी की सेवा में हाजिर हो गए। फिर जब वो अगला कार्य करने लगे तो भरत जी आ गए, फिर शत्रुध्न और अंत में जानकी जी। इस प्रकार सभी सेवाओं में किसी न किसी को तत्पर देखकर हनुमान जी अत्यन्त चकित हुए।

वह उदास मन से महल के बाहर बैठ गए। करूणा से युक्त जानकी जी हनुमान जी को देखकर कहने लगी, " बेटा ! इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। हमने रात को सभा बुला कर राम जी के समस्त काम आपस में बांट लिए हैं।"

हनुमान जी बोले," माता मेरे हिस्से में कौन सा काम आया है।"

इस पर लक्ष्मण जी बोले," अरे हनुमान ! जी हम तो आप को भुल ही गए थे।"

हुनमान जी समझ गए यह सारी योजना मुझे राम जी की सेवा से वंचित करने के लिए बनाई गई है। दुखी होकर वह बिलख बिलख कर रोने लगे और राम जी का सिमरण करने लगे। फिर कुछ समय उपरांत बोले," जब प्रभु जंभाई लेंगे तो आप में से चुटकी कौन बजाएगा।"

वह सभी एक दूसरे का मुंह देखने लगे और बोले," इस का निर्णय तो हमने किया ही नहीं।"

"तो ठीक है यह काम मैं कर लूंगा।"

जाने भगवान को कब जंभाई आ जाए यह सोचकर वह छाया की तरह राम जी के साथ रहने लगे। उस दिन तो वह राम जी के कक्ष में भी पहुंच गए। सीता जी बोली," वत्स ! ब्रह्मचारियों को स्त्रियों के निवास स्थान में प्रवेश नहीं करना चाहिए। अत: अब तुम जाओ।"

हनुमान जी बोले," आप ठीक कह रही है मगर रात के समय ही तो जंभाई आती है। मेरा इस समय यहां रहना अवश्यक है।"

सीता जी को गुस्सा आ गया। राम जी बोले," जब तक तुम चुटकी बजाओगे नहीं मुझे जंभाई आएगी नहीं।"

हनुमान जी भगवद आज्ञा पाकर अपनी कुटिया में आ गए और कीर्तन करने लगे। हनुमान जी जैसे जैसे चुटकी बजाते राम जी का जंभाई ले लेकर बुरा हाल हो गया। ब्रह्ममूहर्त के समय नारद जी अयोध्या से निकले तो राम जी की ऐसी हालत देख कर तुरंत हुनमान जी को सूचित करने गए। स्वय पर लज्जित होकर हनुमान जी राम जी के चरणों में जाकर गिर गए और उनसे क्षमा याचना करने लग पड़े।

हनुमान जी के सिर पर हाथ फेरते हुए अपने भाईयों व जानकी जी से बोले," देखा भक्त का अपमान करने का परिणाम कितना भंयकर होता है। जिससे मुझे भयंकर जंभाई रोग लग गया और तुम सभी परेशान हुए। भविष्य में कभी भी हनुमान की निंदा न करना क्योंकि यह तो मेरा आत्मभूत अनन्य भक्त है। मैं अपने किए अपराध को तो क्षमा कर सकता हूं पर अपने भक्त का अपमान कभी माफ नहीं करता।"


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