आत्मा के सिवाय जो कुछ मिलेगा वह बिछुड़ेगा ही

  • आत्मा के सिवाय जो कुछ मिलेगा वह बिछुड़ेगा ही
You Are HereDharm
Monday, December 30, 2013-7:59 AM

निष्काम कर्म करने से हृदय शुद्ध होता है। शुद्ध हृदय से आत्मा का ज्ञान होता है। भलाई के काम खूब करते रहो। किसी स्वार्थ से जो सेवा की जाती है, वह उत्तम सेवा नहीं होती। भले ही कोई कितना भी दिखावा करके अपने को निष्कामी साबित करे परंतु ईश्वर ... सब देखता है, वह सबको यथायोग्य फल देता है। आम बोओगे तो आम मिलेंगे।

 इस संसार में रोते हुए आए हो परंतु अब कुछ ऐसा सत्कर्म करो कि भगवान के धाम को हंसते हुए जा सको। दूसरों का भला करोगे तो तुम्हारा भी भला होगा। भलाई करने के लिए सबके प्रति प्रेम पैदा करो। शुद्ध प्रेम से वर्षों का वैर विरोध भी नष्ट हो जाता है। प्रभु भी प्रेम से ही प्रकट होते हैं। मनुष्य बरबस ही चाहे- अनचाहे भगवान् के प्रेम पाश में बन्ध जाता है। उसे इस सत्य का सहज ही अनुभव हो जाता कि प्रभु ही उसके अपने हैं, उनसे अधिक उनका और कोई सच्चा हितैषी नहीं है।

अपने स्वभाव में माधुर्य नहीं लाएंगे तो मुक्ति से आप दूर होते चले जाएंगे। ध्यान-भजन में बरकत भी नहीं आएगी इसलिए स्वभाव बदलने के प्रति सदा जागृत रहें। अपेक्षारहित जिनका जीवन हो जाता है, उनके संकल्प सत्य हो जाते हैं। भगवान को, अवतारों को, संतों को कोई अपेक्षा नहीं होती। ईश्वर व ईश्वरत्व को प्राप्त हुए सदगुरु दोनों में विपरीत गुण एक साथ पाए जाते हैं।

उनमें प्रेम के साथ न्याय होगा, न्याय के साथ प्रेम होगा। यदि आप ईश्वर व गुरु से इमानदारी से प्यार करते हैं तो उनके लिए आपके हृदय से धन्यवाद के अलावा कुछ नहीं निकलेगा। यदि आपके अंतःकरण से फरियाद निकलती है तो आप समझ लीजिये कि प्यार में कही कोई कमी है। जहां सच्चा प्रेम होता है वहां दोष दर्शन नहीं होता। जीवन जितना अपेक्षारहित बनाओगे उतना ही प्रभु को आप अपने निकट अनुभव करोगे।

गुरु, भगवान व शास्त्रों के वचनों को समझने से हमें परम सुख मिलता है। वस्तुओं तथा सुविधाओं की कमी के कारण हम दुःखी नहीं हैं अपितु ज्ञान व समझ की कमी के कारण हम दुःखी हैं। अपेक्षाएं जितनी बढ़ती जाएंगी, हम उतने ही दुःखी होते जाएंगे। अपेक्षाएं जितनी कम होती जाएंगी, हम उतने ही सुखी होंगे और अपेक्षाएं नहीं हैं तो हम परम सुख में स्थित हो जाएंगे।

 हर इन्सान के पास परम सुख पड़ा है परन्तु हमारे बाह्य वस्तुओं के आकर्षण की नासमझी ने हमको इस परम सुख से दूर कर रखा है इसलिए अप्राप्त का चिन्तन छोड़ो तो ही प्राप्त का अनुभव होगा। अप्राप्त का चिन्तन छोड़ने का सरल तरीका है जो भी आपके पास नश्वर वस्तुएं, सेवाएं उपलब्ध हैं उनक सदुपयोग करो। इस तरह अप्राप्त का चिन्तन छूटते ही व्यक्ति सदा प्राप्त आत्मा में टिक जाता है। आत्मा ही पूर्ण आनन्दस्वरूप है, पूर्ण सुखस्वरूप है और आत्मा के सिवाय जो कुछ मिलेगा वह बिछुड़ेगा ही।


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You