कृष्णावतार

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Monday, December 30, 2013-8:50 AM

प्रद्युम्न जी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि यदि इस प्रकार कठोर नियंत्रण और संयमपूर्वक शिक्षा वह ग्रहण नहीं कर पाएंगे तो समय आने पर वह कभी कसौटी पर पूरे नहीं उतरेंगे। साहसी होने के कारण उन्हें सभी वीरतापूर्ण कार्य अपने पिता श्री कृष्ण जी के संरक्षण और उनकी ही छत्रछाया में करने पड़ते थे परन्तु सफलता के लिए श्रीकृष्ण जी सदा उन्हीं की सराहना किया करते थे और यह बिल्कुल सत्य है कि अपने पिता से प्रेरणा और सहायता मिले बिना प्रद्युम्र ऐसे कार्य सफलतापूर्वक कभी नहीं कर पाते।

युवा प्रद्युम्र जी के बाहु युद्ध का गुरु था पूर्ण मल्ल। पूर्णमल्ल जब आवश्यक समझता तो प्रद्युम्र जी को डांट-फटकार भी देता था परन्तु प्रद्युम्र जी उसकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानते थे और प्रद्युम्र जी की सेवा भी पूर्ण मल्ल ही करता था। जब से वह द्वारिका लौटे थे तभी से जब प्रद्युम्र जी बहुत छोटे थे तब उनकी माता रुक्मणी उन्हें आर्य वीरों की कथाएं सुनाया करती थीं। उन्हीं दिनों शंभरदानव उन्हें उठा कर ले भागा। इस पर महल में कोहराम मच गया। श्रीकृष्ण के सिवाय सब रो पीट रहे थे। बहुत खोज की गई परन्तु वर्षों तक कोई पता नहीं चला। शंभर के महल में मायावती नाम की एक दासी ने प्रद्युम्र जी का पालन पोषण किया। शंभरदानव के राजमहल में प्रद्युम्र जी 12 वर्ष  रहे। मायावती बड़े चाव से उनका पालन-पोषण करती रही।

                                                                                                                                                                       (क्रमश:)

 


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