धन, संपदा, ऐश्वर्य और ख्याति को आमंत्रित करें..

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Tuesday, December 31, 2013-8:00 AM

अनुमानत: 35 वर्ष से अधिक से मैं श्री सूर्य नमस्कार कर रहा हूं। प्रभु ने मुझे जो सुखानुभूति दी है, वह मैं शब्दों में नहीं लिख सकता हूं, ठीक गूंगे को गुड़ का स्वाद न बता पाने की मन:स्थिति की तरह। भगवान श्री सूर्य नारायण प्रत्यक्ष देवता हैं। सृष्टि क्रम में इनका विशेष स्थान है। वैसे तो सूर्य के अनेक नाम (मंत्र) विभिन्न योग-मुद्राओं के साथ जप करने का विधान है परंतु सरलतम उपाय है नाड़ी शोधन करके सूर्य के 12 मंत्रों से सूर्य को अर्ध्य देना।


प्राणायाम के द्वारा जिसका नि:शेष मन धुल गया है, ऐसा मन ही ब्रह्म में स्थित है। अत: सर्वप्रथम सूर्य के सम्मुख नाड़ी शोधन करने का प्रयास करें। ऐसा करने से ही प्राणायाम करने की शक्ति प्राप्त होती है। अपने अंगूठे से दाहिने नथुने को दबा कर बाएं नथुने से अपनी शक्ति के अनुसार श्वास खींचें, फिर तुरंत बाएं नथुने को दबा कर दाहिने से श्वास धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। इसी प्रकार धीरे-धीरे दाहिने नथुने से श्वास खींच कर पूरी तरह फेफड़ों को वायु से भर लें और दाहिना नथुना दबाकर बाएं से श्वास धीरे-धीरे बाहर फैंक दें।

इस प्रकार रुक-रुक कर अपने सामथ्र्यानुसार 3, 5 अथवा अधिक आवृत्तियां पूरी करें। ध्यान को अंदर ही केंद्रित करें। कुछ ही समय में आपकी अंत:नाड़ी शुद्धि हो जाएगी। नाड़ी शोधन के बाद सूर्य देव के सम्मुख जल के किसी पात्र से 12 बार ऐसे जल छोड़ें कि सूर्य की रश्मियां जल से छन कर आपके पूरे शरीर का स्पर्श करें। प्रत्येक अर्ध्य देने से पूर्व सूर्य का एकनाम (मंत्र) जपें)

सूर्य के 12 प्रभावी मंत्र हैं :

1. मित्राय नम:, 2. रवये नम:, 3. सूर्याय नम: 4. भानवे नम:, 5. खगाय नम:, 6. पूष्णे नम:, 7. हिरण्यगर्भाय नम:, 8. मरीचये नम:, 9. आदित्याय नम:, 10. सवित्रे नम:, 11. अर्घाय नम:, 12. भास्कराय नम:।

अंतिम मंत्र जप तथा अर्ध्य के बाद दाएं हाथ की सूर्य उंगली अर्थात अनामिका से अघ्र्य से नीचे गिरे जल को स्पर्श कर अपने आज्ञा चक्र पर लगा कर उसे चैतन्य करें। दोनों हाथों को आपस में रगड़कर उत्पन्न हुई ऊर्जा को चेहरे पर फेर कर उसे कांतिमय बनाएं। हाथों की रेखाओं को देखें। ऐसा भाव जगाएं कि सारी रेखाएं ऊर्ध्वगामी हो रही हैं। इससे सूर्य रेखा व भाग्य रेखा प्रबल होगी। जिस व्यक्ति की ये दोनों रेखाएं प्रबल हो जाएं तो फिर धन, संपदा, ऐश्वर्य, ख्याति आदि उससे कहां दूर रह जाएगी।

                                                                                                                                                   —गोपाल राजू (वैज्ञानिक)
 


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