आखिर आपको जीवन से क्या चाहिए ?

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Thursday, January 02, 2014-2:13 AM

नीतिशास्त्र में कहा गया है कि 'न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:॥"

इसका तात्पर्य यह है कि सिंह अगर शिकार करने न जाए और सोया रहे तो मृग स्वयं ही उसके मुख में नहीं चला जाएगा। यानी सिंह को अपनी भूख मिटानी है तो उसे आलस त्यागकर मृग का शिकार करना ही पड़ेगा।

इसी प्रकार हम सभी को जिस चीज की, जिस मंजिल की तलाश है उसके लिए प्रयास करने की आवश्यकता है। प्रयास का फल देर से मिल सकता है लेकिन परिणाम आपके पक्ष में होगा यह मानकर सही दिशा में प्रयास करते रहना चाहिए।

अपनी पसंद-नापसंद पर विचार करें। ईश्वर ने सभी के अंदर किसी न किसी हुनर का समावेश किया होता है। जरूरत होती है तो बस उसे पहचानने की। अपने अंदर छिपी प्रतिभा व दक्षता पर विचार करें और मंजिल को पाने की दिशा में आवश्यक प्रशिक्षण व दक्षता को विकसित करने की खास योजना बनाएं।

अपने लिए मंजिल की तलाश करने से पहले आप खुद को जानने की कोशिश करें। हम में से अधिकांश लोग शायद ही इसके बारे में विश्लेषण कर पाते हैं कि हमारी पसंद-नापसंद है क्या ? इसलिए आप सबसे पहले इस बात को तय कर लीजिए कि आपकी अभिरुचि किसमें है। खुद से यह जानने की कोशिश करें कि आखिर आपको जीवन से क्या चाहिए ?

विश्व में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसकी सारी ईच्छाएं पूरी होती है, जिसके जीवन में मनचाही ही मनचाही होती है, और अनचाही कभी भी नहीं होती। जीवन में अनचाही होती ही है। यह शरीर और मन का परस्पर संबंध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ मन में जागने वाले विचार एवं विकार हैं और दूसरी तरफ सांस एवं शरीर पर होने वाली संवेदनाएं हैं। मन में कोई भी विचार या विकार जागता है तो तत्क्षण सांस एवं संवेदनाओं को प्रभावित करता ही है।

भगवान बुद्ध ने यही सिखाया—


जीवन जीने की कला। उन्होंने किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं की। उन्होंने अपने शिष्यों को मिथ्या कर्म-कांड नहीं सिखाये। बल्कि, उन्होंने भीतर की नैसर्गिक सच्चाई को देखना सिखाया।


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