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दुखों को मिटाएं एवं सुखों को टिकाएं

  • दुखों को मिटाएं एवं सुखों को टिकाएं
You Are HereReligious Fiction
Friday, January 03, 2014-2:32 AM

कोई रूपया चाहता है तो कोई गहने गांठे लेकिन सबका उद्देश्य यही होता है कि दुख मिटे और सुख सदा टिका रहे। सुख के साधन अनेक हो सकते हैं लेकिन सुखी रहने का उद्देश्य सबका एक है। दुख मिटाने के उपाय अनेक हो सकते हैं लेकिन दुख मिटाने का उद्देश्य सबका एक है, चाहे चोर हो या साहुकार। साहुकार दान पुण्य क्यों करता है कि यश मिले। यश से क्या होगा सुख मिलेगा ?

भक्त दान पुण्य क्यों करता है कि भगवान रीझें भगवान के रिझने से क्या होगा आत्म संचोष मिलेगा। व्यापारी दान पुण्य क्यों करता है कि धन की शुद्धि होगी। धन की शुद्धि से मन शुद्ध होगा, सुखी होंगे। दान लेने वाला दान क्यों लेता है ? कि दान से घर का गुजारा चलेगा। मेरा काम बनेगा अथवा इस दान को सेवाकार्य में लगाएंगे। इस प्रकार मनुष्य जो जो चेष्टाएं करता है वह सब दुखों को मिटाने के लिए एवं सुख को टिकाने के लिए ही करता है।

वासनापूर्ति से सुख टिकता नहीं और दुख मिटता नहीं। अत वासना को विवेक से निवृत्त करो जैसे पहले के जमाने के लोग तीर्थों में जाते थे तो जिस वस्तु के लिए ज्यादा वासना होती थी वही वहां छोड़कर आते थे। ब्राह्मण पूछते थे कि," तुम्हारा प्रिय पदार्थ क्या है ?"

तो जातक अपनी प्रिय वस्तु का नाम लेता तो ब्राह्मण कहता था अपनी इस प्रिय वस्तु को भगवान जी के अर्पण कर दो कि अब कुछ समय तक अथवा ताउम्र इस पदार्थ को ग्रहण नहीं करूंगा। जो अधिक प्रिय होगा उसमें वासना प्रगाढ़ होती है और जीव दुख की राह पर अग्रसर हो जाता है। अगर अपनी प्रिय वस्तु का त्याग कर दिया तो वासना कम होती जाएगी एवं भगवत्त प्राप्ति बढ़ती जाएगी।  

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