....इसलिए शनि को शनैश्च भी कहा जाता है

  • ....इसलिए शनि को शनैश्च भी कहा जाता है
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Sunday, January 05, 2014-5:06 AM

सूर्य देव समस्त संसार को तेज प्रदान करते हैं। सूर्य की पूजा करने से भक्तों का रूप भी उनके जैसा ही तेजस्वी और गौर वर्ण हो जाता है। फिर उनके स्वयं के पुत्र शनि देव का रंग रूप श्याम वर्ण अर्थात काला क्यों है। शास्त्रों से ज्ञात होता है कि सूर्य देव का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री संज्ञा से हुआ था। सूर्य का तेज इतना तेजस्वी था कि उसे सामान्य आंखों से देख पाना संभव नहीं था।

उनकी पत्नी संज्ञा से उनके तेज का सामना करना कठिन था। फिर भी वह उनके साथ गृहस्थ जीवन का र्निवाह खुशी खुशी करती रही। कुछ समय उपरांत देवी संज्ञा के गर्भ से तीन संतानों मनु, यम और यमुना का जन्म हुआ। देवी संज्ञा के लिए सूर्य देव का तेज सहन कर पाना मुश्किल होता जा रहा था। एक दिन संज्ञा ने अपनी छाया के प्रतिरूप को पति सूर्य की सेवा में लगा दिया और खुद वहां से प्रस्थान कर गई।

छाया सूर्य देव के साथ पत्नी रूप में रहने लगी। संज्ञा की छाया की कठोर तपस्या से ज्येष्ठ मास की अमावस्या को सौराष्ट्र के शिंगणापुर में सूर्यपुत्र शनि का जन्म हुआ। छाया ने शंकर जी की कठोर तपस्या की, तो तेज गर्मी और धूप के कारण उनके गर्भ में शनि का वर्ण काला हो गया। अन्य मान्यता के अनुसार छाया का स्वरूप काला होता है इसलिए शनि श्याम वर्ण हुए।

शनि नौ मुख्य ग्रहों में से एक हैं। शनि शनिवार के स्वामी हैं। शनि अन्य ग्रहों की तुलना मे धीमे चलते हैं इसलिए इन्हें शनैश्च भी कहा जाता है। शनिदेव का नाम या स्वरूप ध्यान में आते ही मनुष्य भयभीत अवश्य होता है लेकिन, कष्टतम समय में जब शनिदेव से प्रार्थना कर उनका स्मरण करते हैं तो वे ही शनिदेव कष्टों से मुक्ति का मार्ग भी प्रश्स्त भी करते हैं। पूरे साल हर शनिवार के दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने और सरसों के तेल का दिया जलाने से प्रसन्न किया जा सकता हैं। शनिवार को सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करके इसके साथ ही इस दिन शनि चालीसा का पाठ विशेष फल प्रदान कराता हैं।


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