जब गंगा को जटाओं में बांध लिया भगवान शिव ने

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Monday, January 06, 2014-7:38 AM
गंगावतरण के लिए केवल महाराज सगर के 60 हजार पुत्रों की सद्गति का ही प्रश्न नहीं था बल्कि सुखी धरती माता और जीव-जन्तुओं की प्यास बुझाने के लिए भी गंगावतरण अनिवार्य हो गया था। गंगावतरण के लिए अभीष्ट तप और मार्ग की कठिनाइयों का सामना करने के लिए जब सब पीछे हट रहे थे तब भागीरथ आगे आए और बोले, "लोक मंगल की आवश्यकताएं अधूरी नहीं रखी जा सकती हैं। वह मनुष्य ही क्या जो अपनी आंखों के सामने मानवता पर लगे ग्रहण को देखता रहे पर संसार के कल्याण के लिए उसका ह्रदय रत्ती भर न पिघले।"

मार्ग की कठिनाइयों को जानते हुए भी भागीरथ चल पड़े। कुटुम्बियों से लेकर मार्ग में मिले मित्रों तक सबने उनसे यही कहा, "भागीरथ जो काम भगवान का है उस कार्य में मनुष्य का प्रयत्न करना बेकार है। पृथ्वी प्यासी है ! सगर-सुत मूर्छित पड़े हैं तो यह सब ईश्वर की इच्छा है, भगवान की इच्छा के आगे मनुष्य भला क्या कर सकता है।"

भागीरथ हंसे और बोले, "परमात्मा तो मंगलस्वरूप है वह अमंगल क्यों सोचेगा, क्यों करेगा, मनुष्य भूलवश कष्ट में पड़ता है और भ्रमवश उनसे निकल नहीं पाता। मानवता को उत्कर्ष की प्रेरणा देने और उसे अमंगल के अभिशाप से बचाने के लिए भगवान ने मनुष्यों को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है। अन्य जीवों की तुलना में मिली विभूतियां इस बात का प्रमाण हैं कि मनुष्य को अपना स्वार्थ लौकिक और भौतिक सुखों तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए वरन अपनी सामान्य सी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जो थोड़ा समय लगता है उससे बचा सारा समय लोक मंगल के लिए लगाना चाहिए।"

उनकी इस दृढ़ता और साहस की सभी ने बहुत प्रशंसा की। भागीरथ चल पड़े। हिमालय जाकर उन्होंने घोर तप किया। उनके तप से प्रभावित होकर गंगा प्रकट हुई और बोली, "तात! उठो मैं आ गई, मैं तो संसार की भलाई के लिए पहले से ही तैयार थी किन्तु मैं जब पृथ्वी पर उतरूंगी तो मेरी धार पृथ्वी को फोड़कर पार चली जाएगी, उस प्रखरता को संभालेगा कौन? इस समस्या को सुलझाने का प्रयास करने में ही इतना विलम्ब हुआ।"

भागीरथ विस्मय में पड़ गए पर उसके लिए उन्हें देर तक चिन्तित नहीं होना पड़ा, भगवान शिव वहां आ पहुंचे और बोले, "भागीरथ! मनुष्य अपना जीवन पारमार्थिक लक्ष्य में लगाए और उसे ईश्वरीय सहायता न मिले तो भगवान कैसे जिन्दा रहेगा। उठो तुम्हारी सहायता के लिए हम आ गए हैं। गंगाजी के वेग को हम संभालेंगे। " गंगा उतरी और शिव जी की जटाओं में समा गई। शिव जी ने उन्हें सौम्य रूप प्रदान कर धरती में प्रवाहित कर दिया।

भागीरथ भगवान शिव की कृपा के लिए उनकी स्तुति करने लगे तो शंकर भगवान बोले, "भागीरथ ! तप तूने किया इसलिए श्रेय का अधिकारी भी तू है। लोक मंगल के आदर्श और गौरव को मनुष्य जाति भूले नहीं इसलिए इस तप का फल तुझे मिलना ही चाहिए। आज से गंगाजी का नाम तुम्हारे नाम पर ' भागीरथी' रखा जाता है। तुम्हारा आदर्श चिरकाल तक धरती के लोगों को लोक-कल्याण के लिए तप और त्याग की प्रेरणा देता रहेगा।"


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