पंजाब की लोक संस्कृति का अक्स है लोहड़ी का त्योहार

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Monday, January 13, 2014-7:42 AM

लोहरी को पंजाब में लोहड़ी बोला जाता है। यह त्योहार 13 जनवरी को मनाया जाता है। मकर सक्रांति की पूर्व संध्या पर पंजाब और हरियाणा प्रदेशों में बड़ी धूम-धाम से 'लोहड़ी ' का त्योहार मनाया जाता है। यह पंजाबियों का बहुत ही प्रिय त्यौहार है। नए साल में मनाया जाने वाला पहला त्योहार लोहड़ी हरियाणा समेत अन्य राज्यों व विदेशों में रह रहे पंजाब के लोग काफी धूमधाम से मनाते हैं।

लोहड़ी के कुछ दिन पहले से ही छोटे-छोटे बच्चे "सुन्दर मुन्द्रिए हो, तेरा कौन विचारा" इत्यादी गीत गाते हुए उपले (पाथी) या लकड़ी इकट्ठे करने लगते हैं। घरों में शाम के समय आग जलाई जाती है। लोग अग्नि के चारों ओर चक्कर काटते हैं और तिल डालते हैं। आग के चारों ओर बैठकर स्त्री, पुरुष और बच्चे आग सेंकते हैं और मूंगफली, रेवड़ी व मक्का के खिल्ले आदि बड़े आनंद से खाते हैं। लोग एक दूसरे को लोहड़ी की बधाई देते हैं। घर में वधु की पहली लोहड़ी और बच्चे की पहली लोहड़ी बहुत अच्छे ढंग से मनाई जाती है।

इस त्योहार का संबंध इस मौसम की फसल से है। इस वक्त खेतों में गेहूं और सरसों की फसल में गजब की लहलहाहट होती है। यह मुख्य रूप से किसानों का पर्व है लेकिन इसमें हर वर्ग के लोग शामिल होते हैं। इस त्योहार का कोई धार्मिक जुड़ाव नहीं है। यूं कहा जाए की यह पंजाब की सभ्यता का प्रतीक है। लोहड़ी शब्द तिल और रोड़ी शब्दों के मेल से बना है, जो पहले तिलोड़ी और फिर समय के साथ साथ बदलकर अब लोहड़ी कहलाने लगा है।

लोहड़ी त्योहार की शुरुआत को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं। एक मान्यता के अनुसार अकबर के जमाने में पंजाब में एक सड़क लुटेरा दुल्ला भट्टी हुआ करता था। एक बार तब के नवाबजादे कुछ हिन्दू लड़कियों को बेचने के लिए मध्य-पूर्व में ले जा रहे थे। ऐसे में यह उसे अन्याय लगा और उसने उन सभी लड़कियों को बचाया। फिर बाद में उनकी शादी भी हिन्दू लड़कों से कराई। उसने सभी का खुद कन्यादान भी किया और शगुन के रूप में उसने सभी लड़के वालों को और लड़की वालों को शक्कर दी। यह बात धीरे-धीरे पूरे पंजाब में फैल गई। फिर तो वह पंजाब का मसीहा हो गया। तब से पूरे पंजाब में यह त्योहार मनाया जाने लगा।

लोहड़ी के हर गीत में दुल्ला भट्टी को धन्यवाद देने जैसा भाव होता है। दुल्ला भट्टी की जुल्म के खिलाफ मानवता की सेवा को लोग आज भी खूब याद करते हैं। दूसरी मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि संत कबीर की पत्नी ‘लोई’ के नाम पर यह त्योहार मनाया जाता है इसीलिए पंजाब के गांवों में लोहड़ी को लोई के नाम से भी पुकारा जाता है।

आजकल कुछ लोग कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए लड़कियों के जन्म पर भी बड़ी खुशी से लोहड़ी मनाते हैं। कुछ का मानना यह भी है कि होलिका और लोहड़ी दोनों बहनें हैं।


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