...जब सूर्य देव ने देवताओं को पुन: स्वर्ग का आधिपत्य दिलाया

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Sunday, January 19, 2014-4:12 AM
प्राचीनकाल से ही दैत्यों और देवताओं में शत्रुता रही है। अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए दैत्य सदा देवताओं पर आक्रमण कर युद्ध करते रहे हैं। स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए दैत्यों और देवताओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ और बहुत वर्षों तक यह युद्ध चलता रहा। युद्ध ने इतना प्रचण्ड रूप धारण किया कि देवताओं और सृष्टि का अस्तित्व संकट में आ गया।

युद्ध में दैत्यों से हारने के पश्चात समस्त देवता जान बचाने के लिए वनों में भटकने लगे। अपनी संतान के ऐसे जीवन से उनके पिता महर्षि कश्यप और माता अदिति बहुत दुखी हुए। एक दिन देवर्षि नारद कश्यप जी के आश्रम की ओर से निकल रहे थे। तभी उनकी दृष्टि देव माता अदिति और महर्षि कश्यप जी पर पड़ी। वे दोनों बहुत व्यथित लग रहे थे। नारद जी ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी चिंता का कारण पूछा। देव माता अदिति बोलीं-“ देवर्षि ! दैत्यों ने युद्ध में मेरे पुत्रों को पराजित कर दिया है। जान बचाने के लिए वे वनों में भटक रहे हैं। उनकी प्राण रक्षा कैसे होगी इसलिए हम बहुत दुखी हैं।”

देव माता की बात सुनकर नारद जी बोले- “हे माता! इस दुख से उभरने के लिए आप भगवान सूर्य को अपनी आराधना से खुश करें और उन्हें अपनी कोख से उत्पन्न होने का वर मांगें। सूर्य देव का तेज इतना तीव्र है कि उसके समक्ष दैत्य कदापि न टिक पाएंगे और देवताओं की रक्षा हो जाएगी।” अदिति ने नारद जी के कहे अनुसार भगवान सूर्य देव की तपस्या करनी आरंभ कर दी।

सैंकड़ों वर्ष तपस्या करने के बाद भगवान सूर्यदेव साक्षात प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। अदिति बोलीं, “हे सूर्यदेव! आप से मेरी प्रार्थना है कि आप मेरे को पुत्र रूप में प्राप्त हों और देवताओं की रक्षा करें।”

अदिति को पुत्र रूप में प्राप्त होने का वर देकर सूर्य भगवान अंर्तध्यान हो गए। कुछ समय पश्चात सूर्य भगवान अदिति के गर्भ में आ गए। महर्षि कश्यप और अदिति बहुत प्रसन्न हुए कि अब तो उनके पुत्र देवताओं को वन वन भटकना न पड़ेगा। जल्द ही वह अपना खोया अस्तित्व प्राप्त कर लेंगे।

एक रोज महर्षि कश्यप और अदिति वार्तालाप कर रहे थे। कश्यप जी को किसी बात पर गुस्सा आ गया। गुस्से में आकर उन्होंने अदिति के गर्भस्थ शिशु के लिए ‘मृत’ शब्द का प्रयोग किया। कश्यप जी ने जैसे ही ‘मृत’ शब्द का उच्चारण किया। उसी समय अदिति की काया में से एक दिव्य प्रकाश पुंज निकला। उस प्रकाश पुंज का तेज इतना तीव्र था कि उसे देखकर कश्यप मुनि बहुत डर गए और सूर्य देव से अपने द्वारा उपयोग किए गए ‘मृत’ शब्द के लिए माफी मांगने लगे।

उसी समय एक दिव्य आकाशवाणी हुई, “ मुनिवर! मैं आपके द्वारा किए गए अपराध को क्षमा करता हूं। मेरी आज्ञा का पालन करते हुए तुम इस पुंज की नियमित उपासना करो। उचित समय आने पर इसमें से एक दिव्य बालक का जन्म होगा और तुम्हारी समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने के उपरांत ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थापित हो जाएगा।”

आकाशवाणी के कहे अनुसार महर्षि कश्यप और अदिति ने वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए प्रकाश पुंज की आराधना करनी शुरू कर दी। उचित समय आने पर उसमें से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। उसके शरीर से दिव्य तेज निकल रहा था। यही शिशु ‘आदित्य’ और ‘मार्तण्ड’ आदि नामों से विख्यात हुआ। आदित्य ने संपूर्ण वनों का भ्रमण किया और अपने भाई देवताओं को इकट्ठा किया। आदित्य के तेज और बल को देख कर इन्द्र और समस्त देवतागण बहुत प्रसन्न हुए।

देवताओं ने आदित्य को अपना सेनापति बनाया और दैत्यों पर आक्रमण कर दिया। आदित्य का तेज इतना तीव्र था की उसके समक्ष दैत्य अधिक समय तक टिक नहीं पाए। रणभूमि छोड़कर अपने प्राण रक्षा के लिए वे पाताल लोक में जाकर छिप गए। सूर्यदेव की कृपा से स्वर्ग लोक में पुनः देवताओं का अधिपत्य स्थापित हो गया और उन्हें जगत पालक और ग्रहराज के रूप में स्वीकार किया। देवों को दैत्यों के प्रकोप से सुरक्षित करने के पश्चात सूर्यदेव ब्रह्माण्ड के मध्य भाग में स्थापित हो गए और वहीं से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का कार्य-संचालन करने लगे।

 


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