...इसलिए गणेश जी को आदिपूज्य भी कहते हैं

  • ...इसलिए गणेश जी को आदिपूज्य भी कहते हैं
You Are HereDharm
Wednesday, January 22, 2014-7:44 AM
गणेश शिवजी और पार्वती के पुत्र हैं। उनका वाहन मूषक है। गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। ज्योतिष में इनको केतु का देवता माना जाता है, और जो भी संसार के साधन हैं, उनके स्वामी श्री गणेशजी हैं। हाथी जैसा सिर होने के कारण उन्हें गजानन भी कहते हैं। गणेशजी का नाम हिन्दू शास्त्रो के अनुसार किसी भी कार्य के लिये पहले पूज्य है। इसलिए इन्हें आदिपूज्य भी कहते है।

महाभारत लेखन में गणेश जी का अपना वर्चस्व है जो कि उनकी पूजा-अर्चना से बिल्कुल भिन्न है। महाभारत में ऐसा वर्णन आता है कि वेदव्यास जी ने हिमालय की तलहटी की एक पवित्र गुफा में तपस्या में संलग्न तथा ध्यान योग में स्थित होकर महाभारत की घटनाओं का आदि से अन्त तक स्मरण कर मन ही मन में महाभारत की रचना कर ली। परन्तु इसके पश्चात उनके सामने एक गंभीर समस्या आ खड़ी हुई कि इस काव्य के ज्ञान को सामान्य जन साधारण तक कैसे पहुंचाया जाये क्योंकि इसकी जटिलता और लम्बाई के कारण यह बहुत कठिन था कि कोई इसे बिना कोई गलती किए वैसा ही लिख दे जैसा कि वे बोलते जाएं। इसलिए ब्रह्मा जी के कहने पर व्यास गणेश जी के पास पहुंचे और उन्हें महाभारत को लिखने के लिए निवेदन किया।

गणेश जी मान तो गए मगर उन्होंने महर्षि वेदव्यास जी से एक प्रण लिया कि वे अपना लेखन कार्य बीच में नहीं छोड़ेंगे। जहां उन्होंने मन्त्रोच्चारण बन्द किया वहीं पर वह अपनी लेखनी को विराम दे देंगे तथा पुन: वह लेखनी हाथ में नहीं लेंगे। गणेश जी चाहते थे कि व्यास जी का श्लोक वाचन धारा प्रवाह होना चाहिए तथा उसमें अवरोध का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यह प्रण कोई सामान्य प्रण नहीं था क्योंकि किसी भी श्लोक की रचना के लिए तो कुछ समय अवश्य लगता है। परन्तु व्यास जी तो अनेकों ग्रंथों के ज्ञाता और महान ज्ञानी थे।

व्यासजी जानते थे कि यह शर्त बहुत कठनाईयां उत्पन्न कर सकती है अतः उन्होंने भी अपनी चतुरता से एक शर्त रखी कि कोई भी श्लोक लिखने से पहले गणेश जी को उसका का अर्थ समझना होगा। इस तरह व्यास जी बीच-बीच में कुछ कठिन श्लोकों को रच देते थे, तो जब गणेश उनके अर्थ पर विचार कर रहे होते उतने समय में ही व्यास जी कुछ और नये श्लोक रच देते। इस तरह ऋषि व्यास जी तथा गणेश जी ने मिलकर एक ऐसे ग्रन्थ का र्निमाण किया जिसमें एक लाख श्लोक हैं। सम्पूर्ण महाभारत ३ वर्षों के अन्तराल में लिखी गयी। "जो यहां (महाभारत में) है वह आपको संसार में कहीं न कहीं अवश्य मिल जायेगा, जो यहां नहीं है वो संसार में आपको अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा"

 


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You