आत्माएं कैसे पाती हैं नया जन्म?

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Tuesday, January 28, 2014-8:00 AM

श्री मद् भागवत पुराण में जब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था तो उसमें बताया था कि मृत्युलोक अर्थात पृथ्वी पर केवल आत्मा ही अमर है। उसका अंत नहीं होता, वह सिर्फ शरीर रूपी वस्त्र बदलती है। शास्त्रों के मतानुसार आत्मा एक शरीर को त्यागने के पश्चात दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। मरे हुए शरीर की आत्मा दूसरे शरीर में कैसे प्रवेश करेगी?

इस विषय में हिंदू धर्म ग्रंथों में विधान है की जब किसी घर-परिवार से किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तब उस मृत व्यक्ति के निमित्त पिंडदान करने का विधान है।  मान्यता है की पिंडदान के उपरांत आत्मा को नया शरीर मिल जाता है इसलिए मृत व्यक्ति के घर वाले पिंडदान करते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।

श्राद्धों में विधि-विधान से पिंडदान करने से मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति प्राप्त होती है और उसे नया शरीर प्राप्त होने के योग बनते हैं। गरुड़ पुराण में वर्णित है जो मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होने वाला होता है, वह बोल नहीं पाता क्योंकि अंतिम समय में उसे ईश्वर की तरफ से दिव्य दृष्टि प्रदान होती है और वह सारे संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी समस्त इंद्रियों का नाश हो जाता है। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है। पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं।

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