कृष्णावतार

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Tuesday, January 28, 2014-7:53 AM

एक दिन अकेले में कृष्ण जी ने प्रद्युम्र जी से पूछा, ‘‘मायावती कहां है?’’

‘‘आपको वह कभी नहीं मिलेगी।’’

‘‘किन्तु वह है कहां?’’

‘‘उसने वन में निवास करना ही  उचित समझा है।’’ प्रद्युम्र जी ने उत्तर दिया।

‘‘वन में वह क्या कर रही है?’’

‘‘मेरे साथ शाल्व की नगरी में जाने की तैयारी कर रही है।’’

‘‘वह परिवार की अन्य महिलाओं के साथ क्यों नहीं रहती?’’ श्रीकृष्ण ने पूछा।

‘‘पिता जी, कितनी बार तो मैं  आपसे प्रार्थना कर चुका हूं कि आप इसे अपनी और परम पूज्य माता जी की पुत्रवधू स्वीकार कर लें। आप स्वयं उससे मिलें। उसकी भावनाओं को मैं उतने अच्छे ढंग से प्रकट नहीं कर सकता जैसे कि वह स्वयं कर सकती है।’’

‘‘उसे पत्नी रूप में स्वीकार करके तुमने अत्यंत बुरा किया है। क्या तुमने उसे शाल्व की नगरी में ले जाने के विषय में उससे बातचीत की है?’’ कृष्ण जी ने पूछा।

‘‘वह तो इसे प्रायश्चित का एक ढंग समझती है।’’ प्रद्युम्र जी ने बताया।

‘‘क्या तुम्हें पक्का विश्वास है कि वह अब भी वन में ही है?’’ कृष्ण जी ने पूछा।

‘‘मैं भी तो वन में रहता हूं उसके साथ।’’ प्रद्युम्र जी ने उत्तर दिया।

                                                                                                                                                            (क्रमश:)


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