जीवन में सुख-स्मृद्धि और शांति का समावेश क्यों नहीं हो पाता

  • जीवन में सुख-स्मृद्धि और शांति का समावेश क्यों नहीं हो पाता
You Are HereDharm
Friday, January 31, 2014-8:20 AM

शास्त्रों के मतानुसार घर के दोषों का वास्तु के माध्यम से निवारण किया जा सकता है, काया में कोई रोग उत्पन्न हो जाए तो उसका इलाज दिवाईयों के माध्यम से किया जा सकता है, ग्रह दोष का निवारण ज्योतिष के माध्यम से किया जा सकता है और मानसिक शांति के लिए योग एवं धर्म मार्ग को पालन करने के लिए कहा गया है।

इन सब नियमों का पालन करने के पश्चात भी अगर हमारे जीवन में सुख स्मृद्धि और शांति का समावेश न हो तो क्या हम शास्त्रों को गलत ठहराएंगे अथवा शास्त्रों के रचयिता को। जीवन में आ रही बाधाओं, कष्टों, दुखों व परेशानियों का कारण है पूर्व जन्म में अर्जित किए गए कर्म। जिनके अनुरूप सुख दुःख आते रहते हैं।

कर्म तभी संभव हो सकता है जब हम आत्म भाव में स्थिर रहे और हर पल चित्त से प्रेम की धारा बहती रहे। जब कर्म किया जाता है तो उस कर्म का फल हमारे जीवन की संचित पूंजी का हिस्सा बन जाता है और बुरे कर्म करने से पाप कर्मों का। इन  दोनों तरह के कर्मों का फल व्यक्ति को अवश्य भोगना होता है। जब अच्छे कर्म करते है तो पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यदि इस जन्म में वो प्राप्त नहीं हो पाएं तो अगले जन्म में पुण्य फल मिलते है या फिर एक जन्म से दूसरे जन्म के बीच के समय में भी चित्त उसी भाव में रहने से सुख का अनुभव करता है। जिसको स्वर्ग कहा जाता है।

जब हमारे पुण्य कर्म जागृत होते हैं उस समय में दुःखों को दूर करने में वास्तु शास्त्र, ज्योतिष, औषधि उपचार आदि सहायक सिद्ध होते हैं। जीवन में कुछ कर्म ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव चित्त में जाकर मिल जाता है,फिर जब तक उन कर्मों का फल मिल न जाए वो चित्त में ही संचित रहते हैं, ऐसे पुण्य कर्मों को संचित कर्म कहा जाता है। जो चित्त में कुछ दिन, महीनों और साल तक ही नहीं बहुत से जन्मों बाद भी जमा रह सकते हैं।  शास्त्रों में ज्ञान योग का वर्णन है जिसके सिद्ध होते ही संचित कर्म ऐसे ख़त्म हो जाते हैं जैसे सैंकड़ों सालों की काल कोठारी का अन्धेरा केवल एक दीपक से दूर हो जाता है।  








 


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You