विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को अपने ह्वदय में स्थान क्यों नहीं दिया?

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Friday, January 31, 2014-8:26 AM

प्रसिद्ध पौराणिक सागर-मंथन की गाथा के अनुसार जब सागर मंथन किया गया  तब कालकूट विष के अलावा चौदह रत्‍‌न निकले। इसके बाद नित्यशक्ति लक्ष्मी प्रकट हुई। भव्य रूप और आकर्षण के फलस्वरूप सारे देवता, दैत्य और मनुष्य उनसे विवाह करने हेतु लालायित थे, किन्तु देवी लक्ष्मी को उन सबमें कोई न कोई कमी लगी।

अत: उन्होंने समीप निरपेक्ष भाव से खड़े हुए विष्णु जी के गले में वरमाला पहना दी। विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को अपने वक्ष पर स्थान दिया। यह रहस्यपूर्ण है कि विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को अपने ह्वदय में स्थान क्यों नहीं दिया?  महादेव शिव जी की अर्धाग्नि पार्वती जी हैं, किन्तु उन्होंने अपने ह्वदय रूपी मान सरोवर में राज हंस राम को बसा रखा है।

उसी समानांतर आधार पर विष्णु के ह्वदय में संसार के पालन हेतु उत्तरदायित्व छिपा था। उस उत्तरदायित्व में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं हो इसलिए संभवत लक्ष्मी जी का निवास वक्ष स्थल बना। लक्ष्मी जी के बगैर समृद्धि की कल्पना नहीं की जा सकती।

कनक धारा स्त्रोत में शंकराचार्य जी ने लक्ष्मी जी को

मांगल्यदास्तु मम मंगल देवताया:

कहकर सम्बोधित किया है। स्पष्ट है कि मंगलकारिणी मां लक्ष्मी केवल धन धान्य प्रदान नहीं करती अपितु समस्त देवताओं की कृपा भी प्राप्त करवाती हैं।


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