सुख और शांति के अक्षय भंडार का दरवाजा खोलें

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Saturday, February 01, 2014-8:05 AM

अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर अंदर डालना चाहिए अध्यात्म-पथ का अवलंबन लेना चाहिए। जगत में इधर-उधर भटकने वाला प्राणी इसी शीतल वृक्ष के नीचे शांति प्राप्त कर सकता है। जब बाहर की माया रुपी वस्तुओं के भ्रम से विमुख होकर हम अंतर्मुखी होते हैं आत्मचिंतन करते हैं तो प्रतीत होता है कि हम अपने स्थान से बहुत दूर भटक गए थे।

आवश्यकताएं कभी पूर्ण नहीं हो सकती हैं। उन्हें जितना ही तृप्त करने का प्रयत्न किया जाएगा उतना ही वे अग्नि में घृत डालने की तरह और अधिक बढ़ती जाएंगी। इसलिए इस छाया के पीछे दौड़ने की अपेक्षा उसकी ओर से पीठ फेरनी चाहिए और सोचना चाहिए कि हम कौड़ियों के लिए क्यों मारे-मारे फिर रहे हैं जबकि हमारे अपने घर में भंडार भरा हुआ है। अंतर में मुंह देखने पर परमात्मा के निकट उपस्थित होने पर वह ताली मिल जाती है। जिससे सुख और शांति के अक्षय भंडार का दरवाजा खुलता है।

अपनी वास्तविक स्थिति को जानने से, आत्मस्वरूप को पहचानने से, संसार के स्वरुप का सच्चा ज्ञान होने से शांति की शीतल धारा प्रवाहित होती है। जिसके तट पर असंतोष की ज्वाला जलती हुई नहीं रह सकती। तब वह मृगतृष्णा को त्याग देता है। सच्चा संतोष उपलब्द्ध होने पर उसकी बाह्य आवश्यकताएं बहुत थोड़ी रह जाती हैं और जब थोड़ा चाहने वाले को बहुत मिलता है , तो उसे बड़ा आनंद प्राप्त होता है।


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