बसंत पंचमी पर भारी मेला लगाकर इस युगल का स्मरण किया जाता है

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Tuesday, February 04, 2014-7:52 AM

15 वर्ष के वीर हकीकत राय और उनके साथ ही सती हो जाने वाली उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी के बलिदान की गाथा भी जुड़ी है वसंत पंचमी के साथ। बच्चों की एक छोटी-सी लड़ाई मृत्युदंड का कारण बनेगी ऐसा कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा परन्तु सन् 1734 ई. के वसंत पंचमी के उत्सव पर मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला के काल में एक नन्हे बालक हकीकत राय पुरी को जब वधशाला की ओर ले जाया जा रहा था तो पूरा नगर अश्रुपूरित आंखों से उसे देख रहा था। हाकिम उसे बचाना चाहते थे, काजी को उस पर दया आ रही थी किन्तु मुल्लाओं के भय से इस बालक को मौत की सजा हो चुकी थी।

वीर हकीकत का जन्म कार्तिक कृष्ण 12 सम्वत् 1776 को हुआ था और मृत्यु के समय उनकी आयु मात्र 15 वर्ष ही थी। उस वीर बाल का जन्म पंजाब के सुप्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र स्यालकोट के एक धनाढ्य तथा पुण्यात्मा खत्री जाति के लाला भागमल पुरी के यहां माता कैंरो की कोख से हुआ था। उन्हीं दिनों परम्परानुसार बटाला के श्री किशन सिंह की पुत्री लक्ष्मी देवी से हकीकत का विवाह भी कर दिया गया था।
 
आत्मा मात्र चोला बदलती है। शरीर नाशवान है। इन बातों का बालक हकीकत को अच्छा ज्ञान था। हकीकत राय कुशाग्र बुद्धि तो थे ही, इसी कारण मौलवी द्वारा मदरसे में उनसे अत्यधिक स्नेह किया जाता था, लेकिन हकीकत को मिलने वाला स्नेह अन्य बच्चों में उनके प्रति इर्ष्या पैदा कर रहा था। एक दिन कक्षा की बागडोर उसे संभालकर मुल्ला जी किसी काम से गए तो अन्य छात्रों ने बवाल खड़ा कर दिया और बच्चों का विवाद धर्म की लड़ाई बन गया।

परस्पर आक्षेप लगने लगे। मदरसे में काफी हंगामा खड़ा हो गया। मुल्ला के आने पर हकीकत की शिकायत बढ़ा-चढ़ाकर लगाई गई। परिमाणस्वरूप नगर शासक के पास अभियोग लाया गया, निर्णय सुनाया गया कि वह अपना धर्म परिवर्तन कर लें अन्यथा इनका वध कर दिया जाए। बालक हकीकत राय को लाड़-प्यार द्वारा धर्म से गिराने का प्रयास किया गया लेकिन हकीकत पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। धर्म प्रिय बालक ने धर्म के स्थान पर सिर देना स्वीकार किया।

 वीर बालक का दाह संस्कार बड़ी धूमधाम से लाहौर से लगभग 5 किलोमीटर दूर रावी नदी के तट पर कोट खोजेशाह के क्षेत्र में वसंतोत्सव पर किया गया और बाद में वहां समाधि बनी। इस बलिदान का समाचार सुनकर उनके ससुराल बटाला में कोहराम मच गया किन्तु उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी ने अपनी मां को दिलासा देते हुए सती होने की ठान ली।

उसने चिता सजाई। सबके सामने अपने प्राण प्यारे पति हकीकत राय का ध्यान करते हुए अंत:करण में परमेश्वर का स्मरण करते हुए चिता में कूदकर सती हो गईं और उसके बाद बटाला में ही लक्ष्मी देवी की भी समाधि बना दी गई। हकीकत राय का स्मारक तो विभाजन के बाद पाकिस्तान में रह गया किन्तु लक्ष्मी देवी की समाधि पर प्रतिवर्ष भारी मेला लगाकर इस युगल का स्मरण किया जाता है और इसी दिन वसंत पंचमी होती है।
  
दैनिक प्रार्थना सभा बटाला जो सामाजिक कार्यों में देशभर में हमेशा अग्रणी रही है, के संचालक महाशा गोकुल चंद के नेतृत्व में वीर हकीकत राय की पत्नी सती लक्ष्मी देवी की याद में बहुत बड़ा स्मारक बना हुआ है और यहां सभा की ओर से प्रतिवर्ष वसंत पंचमी के उत्सव पर बलिदान दिवस के रूप में बहुत बड़े समारोह का आयोजन किया जाता है।
        
                                                                                                                                                    —योगेश बेरी/विपन पुरी, बटाला


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