मानवता की सेवा को समर्पित भगत पूरन सिंह जी

  • मानवता की सेवा को समर्पित भगत पूरन सिंह जी
You Are HereDharm
Tuesday, February 04, 2014-5:18 PM

सेवा वह है, जिसमें सेवक के मन में किसी प्रकार का छल, प्रपंच या स्वार्थ न हो। सेवा के बदले मन में कोई आकांक्षा न हो। मानव-सेवा के लिए मदर टेरेसा का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। उन्हें नोबल पुरस्कार और भारतरत्न से सम्मानित किया गया। पंजाब में जहां समृद्धि, शक्ति और रहम के भावों से भरपूर लोगों का वास है वहीं इस सरजमीं पर अनेकों गुरुओं, पीरों के अवतार हुए हैं जिन्होंने निरंतर मानवता की सेवा की और आम लोगों के मार्ग दर्शन में ही सारा जीवन व्यतीत किया। इसके फलस्वरूप ही पंजाब में देशभक्ति, प्रेम, बलिदान और दया की भावना लोगों में उपजी।

मानवता की नि:स्वार्थ और स्वयंसमर्पित सेवाभाव में सबसे प्रमुख नामों में से एक हैं भक्त पूरन सिंह जी।  पूर्ण सिंह जी करूणा, मानवता, सेवा, सादगी, सच्चाई, सिमरन और दया का पुंज थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन लोकसेवा में लगा दिया। उन्होंने नि:स्वार्थ भाव से मानवता की जो सेवा की है, उसके लिए स्वयं मानवता उनकी ऋणी है। अमृतसर के पास उन्होंने पिंगलवाड़ा आश्रम की स्थापना की।

वे हमेशा ऐसे लोगों की सेवा में आगे रहते थे जो लाचार, बीमार और अपाहिज थे तथा अपनी देखभाल करने में बिल्कुल असमर्थ थे। एक बार उन्हें एक चार वर्षीय अनाथ बालक मिला, जो शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग था। मूक-बधिर होने की वजह से वह बोल नहीं सकता था। पूर्ण सिंह के हृदय में इतनी करुणा उपजी कि उन्होंने बालक को अपना लिया। और अगले चौदह वर्षों तक उसे पीठ पर लादे-लादे ही अपाहिजों और लाचारों की सेवा करते रहे।

1947 में भारत के विभाजन के दौरान बीस पुरुष, महिलाएं और बच्चे गुरुद्वारा डेरा साहिब में रहते थे। पूरन सिंह  जी तड़के से देर रात तक काम करते थे ताकि उन्हें भोजन, कपड़ा और चिकित्सकीय इलाज उपलब्ध करवा सकें। जब वह काम नहीं कर रहे होते, तब वह लाहौर की सड़कों पर अपने मिशन के लिए पैसे जुटाने की कोशिश करते। खूनी घटनाओं ने इस शांतिप्रिय अस्तित्व की शांति को चकनाचूर कर दिया। लाहौर कोई अपवाद नहीं था, 13 अगस्पत, 1947 को गुरुद्वारा शहीद गंज पर हमला हुआ, पर पूरन सिंह और प्यारा सिंह बच गए क्योंकि वे उस दिन गुरुद्वारा डेरा साहिब में थे।

18 अगस्त 1947 को, प्यारा सिंह को अपनी पीठ पर उठाए तैंतालीस वर्षीय पूरन सिंह शरणार्थियों से लदे एक ट्रक से अमृतसर निकल पड़े। उन दर्दनाक दिनों के दौरान भारत तक पहुंचने के लिए सीमा पार करने वाले लाखों शरणार्थियों में से वह एक थे। पूरन सिंह का भारत में न कोई परिवार था और न ही कोई दोस्त या परिचित, जिसकी वह मदद ले सकते थे।  उनके माता - पिता का पहले ही निधन हो चुका था। वह जहां भी जाते प्यारा को अपनी पीठ पर साथ लेकर जाते थे क्योंकि उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं थी। इस मूक-बधिर बालक को वे अपने गले का हार बताया करते थे।

भगत पूरन सिंह ने अमृतसर में बेसहारा लोगों के लिए एक घर पिंगलवाडा़ की स्थापना की।  6 मार्च 1957 को अखिल भारतीय पिंगलवाड़ा सोसायटी को विधिवत सरकार के साथ पंजीकृत किया गया। पिंगलवाड़ा की कई तरह से व्याख्या की है। कुछ के लिए यह 'अपंगों के लिए एक घर है, दूसरों के लिए यह विकलांगों के लिए घर है। भगत जी ने भगवान के जीवों और उनकी रचना की सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की।

भगत पूरन सिंह का जन्म 4 जून 1904 को पंजाब के लुधियाना जिले के गांव रजेवाल में हुआ था। पिता की मृत्यु के बाद उनकी मां ने उन्हें मैट्रिक की परीक्षा पास करने और सरकारी नौकरी खोजने के लिए प्रोत्साहित किया। बेटे की शिक्षा के लिए पैसा व्यवस्थित करने के लिए भगत पूरन सिंह जी की मां ने मिंटगुमरी में एक डॉक्टर के घर में एक घरेलू नौकरानी के रूप में काम किया। इसके बाद वह लाहौर चली गईं, जहां बेटे की शिक्षा के लिए पैसा कमाने के लिए वह लोगों के घरों में बर्तन साफ करने लगीं।

भगत पूरन  सिंह जी को हॉस्टल भेज दिया गया, जहां उनकी मां हर महीने  दस रुपये भेजा करती थीं। लेकिन अफसोस, वह दसवीं की परीक्षा पास नहीं कर पाए, जिससे वह काफी उदास हो गए। इस पर उनकी मां ने कहा कि जो लोग फेल हो जाते हैं वे भी अपनी आजीविका कमा कर खा सकते हैं। उन्होंने इस घटना के बारे में लिखा है- वह एक किसान की बेटी थी। उसने देखा था कि कैसे उसके माता-पिता तड़के खेतों में काम करने जाते थे और दिन भर खेतों में कठोर मेहनत करने के बाद देर शाम घर लौटते थे। लेकिन इसके बावजूद उन्हें यह पता नहीं होता कि उन्हें यह अनाज खाने को मिलेग या उन्हें भूखे रहना पड़ेगा। अगर वह किसी अफसर की बेटी होती तो मेरी असफलता से उसका दिल टूट जाता।

उन्हें लाहौर वापस बुलाया और वहां एक स्थानीय स्कूल में भर्ती कराया, लेकिन  पाठ्यक्रम पुस्तकों में उनकी दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि वे अनुप्रयोगों के साथ काल्पनिक और सैद्धांतिक ज्ञान से भरपूर थीं, जिनका वास्तविक जिंदगी से बिल्कुल कोई संबंध नहीं था। उन्होंने कहा, हालांकि वह दयाल सिंह लाइब्रेरी, लाहौर में किताबें ढूंढने में घंटों बिताते थे और वह जितना ज्ञान हासिल कर सकते थे, करने की कोशिश करते थे। जल्दी ही वह ज्ञान का भंडार बन गए, जहां तक महान विद्वान भी पहुंचने् का सपना नहीं देख सकते।

भक्त पूरन सिंह के पिता हिन्दू और माता सिख थीं। जात-पात और धर्म का भेदभाव किए बगैर उन्होंने लोगों की अपने हाथों से सेवा की। गुरु गोविन्द सिंह के सेवाभाव का आदर्श उनके जीवन का आदर्श था। भगत जी के सेवा के चिंतन के फलस्वरूप पिंगलवाड़ा अनाथों, दीन निराश्रितों, कुष्ठ रोगियों और तमाम तरह के बेसहारा लोगों की सेवा का अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त केंद्र बना। 5 अगस्त1992 में 88 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। वह मृत्युपर्यन्त, दीन-दुखियों की सेवा करते रहे।

- पवनदीप शर्मा


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You