कृष्णावतार

  • कृष्णावतार
You Are HereDharm
Wednesday, February 05, 2014-7:35 AM

‘‘क्या वह मुझसे कुछ बातें करेगी?’’ कृष्ण जी ने पूछा।

‘‘चाचा उद्धव जी तो उससे बातचीत करते ही रहते हैं। आपसे भेंट करने और आपके चरणों में शीश झुकाने के लिए तो वह हर समय उतावली रहती है। आपको वह पिता समान मानती है।’’ प्रद्युम्र जी ने बताया।

प्रद्युम्र जी के मन में यह डर था कि पिता जी भी कहीं माता जी की तरह मायावती के साथ घृणापूर्ण व्यवहार न करें। फिर भी वह घने वन में श्रीकृष्ण जी को ले गए। वहां वृक्षों के एक कुंज के बीच खाली स्थान में एक कुटिया बनी हुई थी। मायावती भोजन तैयार कर रही थी।

मायावती को देख कर श्रीकृष्ण आश्चर्यचकित रह गए। वह तो समझ रहे थे कि मायावती बहुत सुंदर और रूपवती ‘मायावी’ (जादूगरनी) होगी परन्तु वह तो उन्हें एक सीधी-सादी वनवासी लड़की के समान दिखाई दे रही थी। उसने वनवासियों की भांति अपने केश सिर के ऊपर बांध रखे थे।

श्रीकृष्ण जी को आते देख कर वह प्रद्युम्र जी से बोली, ‘‘अरे तुम वासुदेव को क्यों ले आए यहां?’’

‘‘मैं तुमसे भेंट करना चाहता था इसलिए मैंने ही प्रद्युम्र से प्रार्थना की थी कि वह मुझे तुम्हारे पास ले चले।’’ श्रीकृष्ण जी ने बताया।

वह मुस्कुराई और फिर नाराजगी व्यक्त करते हुए बोली, ‘‘लोग कहते हैं कि तुम देवता हो और सबसे अपनी इच्छानुसार ही हर कार्य करवाना चाहते हो।’’

फिर कुछ देर रुक कर वह बोली, ‘‘तुम मुझसे मेरे प्राण छीन लेना चाहते हो। ऐसा तुम कभी नहीं कर पाओगे। यदि तुमने इसका कोई प्रयत्न किया तो...खैर अभी तो मैं नहीं बताती कि क्या कुछ कर डालूंगी।’’                                                                                                                                                                                                                                                                                    (क्रमश:)


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You