मनुष्य न चाहते हुए भी पाप का आचरण क्यों करता है?

  • मनुष्य न चाहते हुए भी पाप का आचरण क्यों करता है?
You Are HereDharm
Friday, February 07, 2014-8:16 AM

इंद्रियों के वशीभूत होकर दुराचार करने से मनुष्य का पतन हो जाता है, इसलिए अपनी इंद्रियों पर विजय पाएं। सद्कर्म कर पवित्रता बनाए रखें  

श्रीमद्भगवदगीता

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।
काम: क्रोधस्तथा लोभ स्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।
                                                                                           (अध्याय 16: 21)

 भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के सोलहवें अध्याय के पांचवें श्लोक में कहा है कि दैवी-संपत्ति मोक्ष के लिए, आसुरी संपत्ति बंधन के लिए है। तो वह आसुरी संपत्ति आती कहां से है? संसार के भोग पदार्थों के संग्रह, मान, बड़ाई, आराम आदि का आकर्षण ही मनुष्य को नरक  की ओर ले जाने वाला है। इसलिए काम, क्रोध, लोभ, मोह मद और मत्सर को षड्रिपु माना गया है।  इनमें से कहीं तीन का, कहीं दो का और कहीं एक का कथन किया जाता है। पर ये सब मिले-जुले हैं, एक ही धातु के हैं। इन सबमें ‘काम’ मूल है क्योंकि काम के कारण ही आदमी बंधता है।

 तीसरे अध्याय के छत्तीसवें श्लोक में अर्जुन ने पूछा था कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप का आचरण क्यों करता है? उसके उत्तर में भगवान ने काम और क्रोध दो शत्रु बताए परन्तु उन दोनों में भी ‘एष’ शब्द देकर काम को ही मुख्य बताया। 21वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि भोगों की तरफ वृत्तियों का होना लोभ है। जहां काम शब्द अकेला आता है वहां उसके अन्तर्गत ही भोग और संग्रह की इच्छा आती है। परन्तु जहां काम और लोभ दोनों स्वतंत्र रूप से आते हैं वहां भोग की इच्छा को लेकर काम और संग्रह की इच्छा को लेकर लोभ आता है।

काम- क्रोध नरक के दरवाजे हैं। इसलिए मनुष्य को इसका त्याग करना चाहिए। अपनी इंद्रियों के वशीभूत होकर कार्य करने से मनुष्य का पतन हो जाता है।


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You