जीवन की समस्त खुशियों को कैसे प्राप्त करें

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Sunday, February 09, 2014-7:48 AM

भगवान शंकर का स्वरुप शक्ति युक्त होने के कारण सर्वाधिक प्रभावशाली और साधक की मनोकामना को पूर्ण करने वाला हैं। शिव मंदिर में जाकर कोई भी जातक शिव परिवार की पूजा अर्चना करके अपने जीवन की समस्त खुशियों को प्राप्त कर सकता है। जहां शिव है वहीं शक्ति है वैसे ही जहां श्री गणेश हैं, वहीं लक्ष्मी माता, श्री कार्तिकेय, भगवती सरस्वती का वास है।

भगवान शंकर गृहस्थ में रहकर भी पूर्ण योगी हैं। सांसारिक व्यवस्था को चलाते हुए  वे पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। वे अपनी धर्मपत्नी को भी मातृ- शक्ति के रूप में देखते हैं। यह उनकी महानता का दूसरा आदर्श है। ऋद्धि- सिद्धि उनके पास रहने में गर्व अनुभव करती हैं। यहां उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्मकल्याण की साधना असंभव नहीं। जीवन में पवित्रता रखकर उसे हंसते- खेलते पूरा किया जा सकता है।

 माता पार्वती ने भगवान शंकर से प्रश्न किया, हे नाथ घर गृहस्थी वाले जातकों का कल्याण कैसे संभव है?

शंकर जी बोले, हे देवी, सदा सत्य वचन करना,समस्त जीवों पर दया भावना बनाएं रखना, मन एवं इंद्रियों पर संयम रखना, जहां तक संभव हो सेवा एवं परोपकार के कार्य करना,माता-पिता और बड़े बुजुर्गों की सेवा करना, घर आए अतिथियों को भगवान का स्वरूप मान उनका आदर सत्कार करना, पराए धन पर दृष्टि न रखना, अपने से बड़ी उम्र की स्त्री को मां, हमउम्र को बहन और छोटी को बेटी के समान समझने वाला,सत्य वचन बोलने वाला, निंदा-चुगली न करने वाले गृहस्थ पर समस्त देवी देवता, ऋषि मुनी एवं महर्षि प्रसन्न रहते हैं। ऐसे जातक का घर गृहस्थी में सर्वदा कल्याण होता है।

सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः         
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियभाषिणी
सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेवकाः ।
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे
साधोः सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥

अर्थात घर में आनंद हो, पुत्र बुद्धिमान हो, पत्नी प्रिय बोलनेवाली हो, अच्छे मित्र हो, धन हो, पति-पत्नी में प्रेम हो, सेवक आज्ञापालक हो, जहां अतिथि सत्कार हो, ईश पूजन होता हो, रोज अच्छा भोजन बनता हो, और सत्पुरुषों का संग होता हो

                                                                                                                                                      – ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है।


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