कार्य सिद्धि के लिए मंगलवार को करें हनुमान जी की साधना

  • कार्य सिद्धि के लिए मंगलवार को करें हनुमान जी की साधना
You Are HereDharm
Tuesday, February 11, 2014-8:39 AM

हनुमान जी की पूजा आरंभ करने के लिए सर्व प्रथम हनुमान जी के श्री स्वरूप अथवा श्री चित्र के समक्ष चंदन, पुष्प, धूप आदि से पूजन करने के उपरांत श्रद्धा से प्रणाम करें तदउपरांत इस प्रकार स्तुति करें

आप महावीर हैं। आप में अतुलबल है। आपके बल को कौन जान सकता है। आप शारीरिक, आध्यात्मिक, नैतिक और हर प्रकार के उच्चतम बल की साक्षात मूर्ति हैं। आपकी यह पुष्ट और सशक्त देह पर्वत के समान है। आप में स्वर्णिम तेज देदीप्यमान है। आपकी देह वीर्यबल से ऐसी दीप्तिमान् है मानो सोने का पर्वत चमक रहा हो। आप शक्ति में राक्षसों और समस्त आसुरी शक्तियों के वन को जलाने के लिए भयंकर दवानल के समान ज्ञानियों में अग्रणी सकल शुभ दैवी गुणों से परिपूर्ण वानर सैना के अधीश्वर, भगवान श्री राम के प्रिय भक्त और स्फूर्ति में पवन जैसे हैं, पवनपुत्र ही हैं। अत मैं कार्य सिद्ध करने के लिए आपकी शक्ति प्राप्त करने के लिए आपको नमस्कार करता हूं।

इस प्रकार हनुमान जी का श्रद्धा पूर्वक ध्यान करके हनुमान चालीसा का प्रेम पूर्वक उच्चारण करें। हनुमान-चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति खुद अपनी शक्ति, भक्ति और कर्तव्यों का आंकलन कर सकता है।

पूजा के बाद केले के पत्ते पर अथवा पान के पत्ते पर चूरमे, भीगे हुए चने या गुड़ का प्रसाद रखें और हनुमान जी को चढ़ाएं। अंत में ऋतुफल चढ़ाएं। थाली में कपूर एवं घी का मिश्रित दीपक जलाएं हनुमान जी की आरती करें। इस प्रकार पूजन करने से हनुमान जी बहुत खुश होते हैं तथा जातक की समस्त मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार।।

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै। कांधे मूँज जनेऊ साजै।।
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रुप धरि सियहि दिखावा। बिकट रुप धरि लंक जरावा।।
भीम रुप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र जी के काज संवारे।।
लाय संजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।
यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्त्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहु को डरना।।
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनो लोक हांक ते कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहि आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुडावैं। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।।
चारो जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै।।
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नाई।।
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महासुख होई।।
जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।

दोहा

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

।।इति ।।

 


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You