बुद्ध देव का चमत्कार व्यापार में दिलाए सफलता बेशुमार

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Wednesday, February 12, 2014-7:54 AM

बुधवार का व्रत करने की चाह रखने वाले जातक को बुधवार के दिन ब्रह्म मूहर्त में उठकर सारे घर को स्वच्छ करना चाहिए। तदउपरांत स्वयं शुद्ध हो कर सारे घर में गंगा जल छिडकें। अगर घर में गंगा जल न हो तो किसी पवित्र नदी का जल छिडक सकते हैं। घर के ईशान कोण में भगवान बुध अथवा शिव शंकर का श्री रूप अथवा श्री चित्र किसी कांस्य के बर्तन में स्थापित करें। धूप, बेल-पत्र, अक्षत और घी का दीपक जलाकर पूजन करते समय निम्न मंत्र का उच्चारण करें

 बुध त्वं बुद्धिजनको बोधद: सर्वदा नृणाम्। तत्वावबोधं कुरुषे सोमपुत्र नमो नम:॥


शाम के समय व्रत कथा सुननें के पश्चात आरती करें। सूर्यास्त होने के पश्चात भगवान बुध अथवा शिव शंकर को धूप, दीप व गुड़, भात, दही का भोग लगाकर प्रसाद बांटें अंत में स्वयं प्रसाद ग्रहण करें।

बुधवार व्रत का महत्व

बुधवार का व्रत करने से बुद्धि कुशाग्र होती है, व्यापार में सफलता प्राप्त होती है, व्यापारिक क्षेत्र की बाधाएं समाप्त होती हैं और जिस जातक की कुण्डली में बुध का अशुभ प्रभाव चल रहा हो उन्हें यह व्रत विशेष रुप से करना चाहिए।

बुधवार व्रत में ध्यान रखने योग्य बातें


1 हरे रंग के वस्त्र पहनें।

2 हरे रंग की वस्तुओं से पूजा करें।

3 इस व्रत का समापन संध्या के समय होता है। अपनी क्षमता के अनुरूप ब्राह्माणों को भोजन कराकर उन्हें दान अवश्य दें।

4  व्रतधारी दिन में एक ही समय भोजन करें।

5 व्रत को बीच में कभी नहीं छोडना चाहिए तथा व्रत की कथा करते समय बीच में उठकर नहीं जाना चाहिए।

6  प्रसाद अवश्य ग्रहण करें।

 बुधवार व्रत कथा

समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति निवास करता था। वह बहुत रईस था। मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर में निवास करने वाली मन मोहिनी और गुणवान लड़की संगीता से हुआ। एक बार मधुसूदन की पत्नी अपने मायके गई हुई थी। मधुसूदन उस को लेने बुधवार के दिन बलरामपुर गया। मधुसूदन ने संगीता के माता-पिता से उसे विदा कराने के लिए कहा।

माता-पिता बोले, ‘बेटा आज बुधवार है। बुधवार के दिन कोई भी शुभ कार्य क्यों न हो यात्रा नहीं करनी चाहिए।´

मधुसूदन को अवश्य काम था उसे अपने गांव वापिस आना था। उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों पर अविश्वास जताते हुए उन्हें आग्रह पूर्वक विदा कराने को कहा।

 दोनों बैलगाड़ी में बैठकर अपने गांव की ओर चल दिए। दो कोस की यात्रा ही पूर्ण हुई थी की गाड़ी का एक पहिया टूट गया। दोनों बाल बाल बचे। दोनों पैदल ही यात्रा करने लगे। पैदल चलते चलते संगीता का गला सुखने लगा। मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठा कर जल लेने चला गया। जब वह लौटा तो उसकी हैरानी का ठिकाना न रहा क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था।

संगीता भी मधुसूदन को देखकर ढंग रह गई। उसे दोनों में अंतर करना मुश्किल हो गया। मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा, ‘तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो?´

मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा, ‘अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है. मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूं लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?´

मधुसूदन ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘तुम जरूर कोई चोर या ठग हो। यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था।´

इस पर उस व्यक्ति ने कहा, ‘अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो। संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था। मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया । अब तुम चुपचाप यहां से चलते बनो नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूंगा।´

दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे। उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहां एकत्र हो गए। नगर के कुछ सिपाही भी वहां आ गए। सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए। सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया। संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी। राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा।

 राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा। तभी आकाशवाणी हुई, ‘मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया. यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है।´

मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि ‘हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई, भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूंगा।´

मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया। तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया। राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए, भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया।

कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई। बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था। दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए। मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे। भगवान बुधदेव की अनुकम्पा से उनके घर में धन-संपत्ति की वर्षा होने लगी। जल्दी ही उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां भर गई। बुधवार का व्रत करने से स्त्री-पुरुषों के जीवन में सभी मंगलकामनाएं पूरी होती हैं और व्रत करने वाले को बुधवार के दिन किसी आवश्यक काम से यात्रा करने पर कोई कष्ट भी नहीं होता है।

 बुधवार व्रत की आरती

आरती युगलकिशोर की कीजै।
तन मन धन न्योछावर कीजै॥
गौरश्याम मुख निरखन लीजै।
हरि का रूप नयन भरि पीजै॥
रवि शशि कोटि बदन की शोभा।
ताहि निरखि मेरो मन लोभा॥
ओढ़े नील पीत पट सारी।
कुंजबिहारी गिरिवरधारी॥
फूलन सेज फूल की माला।
रत्न सिंहासन बैठे नंदलाला॥
कंचन थार कपूर की बाती।
हरि आए निर्मल भई छाती॥
श्री पुरुषोत्तम गिरिवरधारी।
आरती करें सकल नर नारी॥


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