कृष्णावतार

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Wednesday, February 12, 2014-7:54 AM

मायावती ने श्री कृष्ण से आगे कहा, ‘‘सुनना चाहते हो तुम मुझसे कि जिसे मैंने पुत्र की तरह पाल-पोस कर बड़ा किया था वह मेरे जीवन में किस प्रकार समा गया?’’

‘‘अवश्य। मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी सारी बातें सुन कर।’’ श्री कृष्ण ने उत्तर दिया।
 
‘‘एक रात दानव राज अपने सेवकों को साथ लेकर लूटमार करने और मानवों को पकडऩे गया हुआ था और मैं रसोई घर में सोई पड़ी थी। यह मेरे साथ ही सोते थे। आधी रात के पश्चात मेरी आंख खुल गई तो अचानक मैंने अनुभव किया कि अब यह बालक नहीं रहे बल्कि युवा हो चुके हैं और जीवन साथी पाने की अभिलाषा इनके मन में उत्पन्न हो रही है।

 मैं कुछ-कुछ जाग रही थी परन्तु मेरी आंखों में नींद भरी थी। इन्होंने बहुत धीरे से अपने हाथ मेरे शरीर पर रख दिए। मेरे शरीर में कंपकंपी होने लगी। यह भी उत्तेजना से कांप रहे थे। उसी समय हम एक-दूसरे के हो गए। वहां न मंत्र पाठ करने के लिए कोई श्रोत्रिय था और न ही दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देने के लिए बाराती, न ही मेहमानों और सगे-संबंधियों की भीड़ थी।

 सहभोज के लिए मैंने अग्रि प्रज्ज्वलित की। अग्रि देवता का आह्वïन किया। फिर गठबंधन करके हम दोनों ने अग्रि के गिर्द सात फेरे ले लिए और भगवान ने हमें दो शरीर तथा एक प्राण कर दिया। इसके बाद हम यहां आ गए। चाचा उद्धव जी ने हम दोनों के लिए एक कुटिया बना दी और दानवों से हमारी रक्षा के लिए कुछ सैनिकों का प्रबंध भी कर दिया।’’
                                                                                                                                                          (क्रमश:)


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