इस गुफा में से गुजरने से दुश्मनी या बदनीयती पैदा नहीं होती

  • इस गुफा में से गुजरने से दुश्मनी या बदनीयती पैदा नहीं होती
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Wednesday, February 12, 2014-7:59 AM

पाकिस्तान के राज्य बलोचिस्तान में हिंदुओं के बहुत से धार्मिक स्थान मौजूद हैं जिनमें माता हिंगलाज देवी सिद्ध पीठ प्रमुख हैं। माता हिंगलाज देवी 51 सिद्ध पीठों में से एक हैं। जब कभी हिंदू धर्म विरोधी शक्तियों के द्वारा इस मंदिर को नुक्सान पहुंचाने की कोशिश की जाती है तो वह माता की शक्ति के आगे टिक नहीं पाते और मंदिर का कुछ भी नहीं बिगड़ता। माता हिंगलाज देवी माता वैष्णो देवी, मां काली तथा मां दुर्गा के समान ही हैं।

माता हिंगलाज देवी साक्षात मां दुर्गा भवानी हैं। इस आदि शक्ति की पूजा हिंदुओं द्वारा तो की ही जाती है इन्हें मुसलमान भी काफी सम्मान देते हैं। सिंध के प्रसिद्ध सूफी शायर अब्दुल लतीफ शाह ने हिंगलाज देवी की यात्रा करके उन्हें अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए थे। जब सिंधी मुल्तानों ने उनसे पूछा कि वह हिंगलाज देवी की यात्रा के लिए क्यों गए तो उन्होंने कहा-

गर यह चाहे तो बने जोगी
छोड़ हिरसी वाका की दुनिया को
नजारा करना हो तो बंद करो आंखें
सफर ङ्क्षहगलाज है दरपेश जोगी।


उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मंजूम पैराए’ में माता हिंगलाज देवी की यात्रा का विस्तृत उल्लेख किया है। गत वर्ष बलोचिस्तान के प्रधानमंत्री स्वयं एक शिष्ट मंडल के साथ इस पीठ की यात्रा के लिए गए थे।

माता हिंगलाज देवी मंदिर एक प्राचीन मंदिर है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि ने यहां घोर तप किया था। उनके नाम पर आसाराम नामक स्थान अब भी यहां मौजूद है जो भगवान परशुराम के नाम से जाना जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम भी यात्रा के लिए इस सिद्ध पीठ पर
आए थे।

यह मंदिर पाकिस्तान के प्रांत बलोचिस्तान के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इस सिद्ध पीठ की यात्रा के लिए दो मार्ग हैं-एक पहाड़ी तथा दूसरा मरुस्थली। यात्री जत्था कराची से चल कर लसबेल पहुंचता है और फिर लयारी। माता हिंगलाज देवी की यात्रा कठिन है क्योंकि रास्ता काफी ऊबड़-खाबड़ है। इसके दूर-दूर तक आबादी का कोई नामो-निशान तक नजर नहीं आता।

रास्ते में कई बरसाती नाले तथा कुएं भी मिलते हैं। इसके आगे रेत की एक शुष्क बरसाती नदी है। इस इलाके की सबसे बड़ी नदी हिंगोल है जिसके निकट चंद्रकूप पहाड़ हैं। चंद्रकूप तथा हिंगोल नदी के मध्य लगभग 15 मील का फासला है। हिंगोल में यात्री अपने सिर के बाल कटवा कर पूजा करते हैं तथा यज्ञोपवीत पहनते हैं। उसके बाद गीत गाकर अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हैं।

मंदिर की यात्रा के लिए यहां से पैदल चलना पड़ता है क्योंकि इससे आगे कोई सड़क नहीं है इसलिए ट्रक या जीप पर ही यात्रा की जा सकती है। हिंगोल नदी के किनारे से यात्री माता हिंगलाज देवी का गुणगान करते हुए चलते हैं। इससे आगे आसापुरा नामक स्थान आता है। यहां यात्री विश्राम करते हैं।यात्रा के वस्त्र उतार कर स्नान करके साफ कपड़े पहन कर पुराने कपड़े गरीबों तथा जरूरतमंदों के हवाले कर देते हैं। इससे थोड़ा आगे काली माता का मंदिर है। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि यह मंदिर 2000 वर्ष पूर्व भी यहीं विद्यमान था।

 इस मंदिर में आराधना करने के बाद यात्री हिंगलाज देवी के लिए रवाना होते हैं। यात्री चढ़ाई करके पहाड़ पर जाते हैं जहां मीठे पानी के तीन कुएं हैं। इन कुंओं का पवित्र जल मन को शुद्ध करके पापों से मुक्ति दिलाता है। इसके निकट ही पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई दरवाजा नहीं। मंदिर की परिक्रमा में गुफा भी है। यात्री गुफा के एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरी ओर निकल जाते हैं। इस गुफा के संबंध में जनश्रुति है कि यदि दो व्यक्ति इकट्ठा गुफा में से गुजरते हैं तो वे जिंदगी भर भाइयों की तरह रहते हैं। उनमें दुश्मनी या बदनीयती पैदा नहीं होती।  मंदिर के साथ ही गुरु गोरखनाथ का चश्मा है। कहा जाता है कि माता हिंगलाज देवी यहां सुबह स्नान करने आती हैं।
 
हिंगलाज मंदिर में दाखिल होने के लिए पत्थर की सीढिय़ां चढऩी पड़ती हैं। यात्री छत से लटकी घंटी बजाकर माता का गुणगान करते हैं। मंदिर में सबसे पहले श्री गणेश के दर्शन होते हैं जो सिद्धि देते हैं। सामने की ओर माता हिंगलाज देवी की प्रतिमा है जो साक्षात माता वैष्णो देवी का रूप हैं।

स्थानीय निवासियों के अनुसार राजा हिंगोल ने जब अपनी प्रजा को काफी तंग किया तो माता इस पर नाराज हो गईं। जब राजा हिंगोल मुसीबतों से तंग आ गया तो माता हिंगलाज ने दर्शन दिए और कहा कि वर मांगो। राजा ने कहा कि माता मुझे वर दीजिए कि आपका नाम मेरे नाम के साथ लिया जाए ताकि मैं पापों से छुटकारा पा सकूं। माता ने आशीर्वाद दिया कि ऐसा ही होगा। तब से प्राचीन देवी मंदिर राजा हिंगोल के नाम से जुड़ कर माता हिंगलाज देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। माता हिंगलाज देवी रिद्धि-सिद्धि देने वाली हैं।
        
                                                                                                                                        —सुरिन्द्र कुमार बिल्ला, अमृतसर


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