कृष्णावतार

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Tuesday, February 25, 2014-7:40 AM

ऐसे अवसर पर जब प्रद्युम्र जी शाल्व जैसे महापराक्रमी योद्धा से लडऩे जा रहे थे, कृष्ण जी की यह प्रबल इच्छा थी कि वह इन्हें अकेला न जाने दें और स्वयं भी उनके साथ जाएं परन्तु द्वारका में कृष्ण जी के लिए बहुत काम पड़ा था और यहां उनका उपस्थित रहना अत्यंत आवश्यक था।

प्रद्युम्र जी ने कहा, ‘‘पिता जी, यह तो मैं आपको बता ही चुका हूं कि जब मैं राजा शाल्व का वध करने लगा था, तो वह जल्दी से अपने विमान में बैठ कर भाग गया था। यदि वह ऐसा नहीं करता तो या तो मैं उसे मृत्यु के घाट उतार देता या फिर बंदी बना लेता। क्षात्र धर्म के नियमानुसार मुझे ऐसे शत्रु से युद्ध नहीं करना चाहिए, जो मेरा सामना करने के योग्य नहीं है।’’

इसके बाद कुछ शरारत भरे लहजे में वह बोले, ‘‘परन्तु एक बात है, जिस कारण मैं इस नियम को तोड़ रहा हूं। यादवों की रक्षा के लिए आप जीवन भर शत्रुओं से संघर्ष करते रहे और यह संकट सदा के लिए समाप्त कर देने की अब मेरी बारी है।’’

प्रद्युम्र जी की बात सुन कर कृष्ण जी ने स्नेहपूर्वक मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘ठीक है। तुम अवश्य सफल होकर लौटोगे, इस बात का मुझे पूर्ण विश्वास है परन्तु एक बात का अवश्य ध्यान रखना। इस बार किसी बुढिय़ा को ब्याह कर साथ न ले आना। तुम्हारी मां ऐसी बातों के विषय में अत्यंत कठोर है। प्रत्येक विवाहित पुरुष का यह कर्तव्य है कि वह अपनी मां को सुखी रखे और क्षात्र धर्म का पालन करता रहे।’’          

                                                                                                                                                                                      (क्रमश:)


 


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