कृष्णावतार

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Tuesday, March 04, 2014-8:02 AM

जब श्री कृष्ण ने प्रद्युम्र जी को यह समझाया कि प्रत्येक विवाहित पुरुष का यह कर्तव्य है कि वह अपनी मां को सुखी रखे और क्षात्र धर्म का पालन करता रहे तो प्रद्युम्र जी ने उत्तर दिया, ‘‘मैं इसके लिए भरसक प्रयत्न करूंगा पिता जी।’’

कृष्ण जी ने आगे कहा, ‘‘इस भयानक अभियान पर जाने से मैं तुम्हें अवश्य रोकता परन्तु मैं जानता हूं कि यदि तुम अकेले ही वीरता और पराक्रम से भरपूर यह कृत्य करके लौटोगे तो अधिक प्रसन्न रहोगे।’’

प्रद्युम्र जी और उनके दो साथियों ने लावण्य नदी पार की और रेगिस्तान में प्रवेश किया। काफी दूरी तय करने के बाद ये लोग एक मरू उद्यान में पहुंचे और पेड़ों की छांव में कुछ देर विश्राम किया। इसके बाद स्नान करके भोजन किया और रात वहीं व्यतीत की।

सुबह होने पर स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर वे अपनी मंजिल की ओर पुन: चल पड़े। इस मरू उद्यान में उन्होंने देखा कि ऊंट सवारों की एक बहुत बड़ी सेना विश्राम करने के पश्चात आगे बढ़ गई है। यह देख कर प्रद्युम्र जी को यह समझने में देर न लगी कि वे शाल्व की राजधानी की ओर जा रहे हैं।

गर्म बालू पर चलना अत्यंत दुखदायी था फिर भी वे चलते रहे। दोपहर के बाद ये लोग एक छोटी-सी बस्ती में पहुंच गए जहां केवल 10-12 झोंपडिय़ां ही थीं। वहां अनेक बकरियां चर रही थीं। एक कुआं भी था और उसके साथ मवेशियों के पानी पीने के लिए एक हौदा बना हुआ था। बहुत से ऊंट भी थे वहां।
                                                                                                                                                                                   (क्रमश:)


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