स्वयं इन शक्तियों का वास है यहां पर

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Wednesday, March 05, 2014-7:17 AM

भारत के पश्चिम में स्थित पंजाब राज्य का तीसरा बड़ा शहर है जालंधर। जालंधर का नाम पराक्रमी एवं बलवान दैत्य राजा जालंधर के नाम से पड़ा क्योंकि इनकी राजधानी का नाम जालंधर था। जालंधर का जन्म समुद्र मंथन के समय हुआ था। जालंधर राक्षसी प्रवृति का राजा था मगर उसकी पत्नी वृंदा महान पतिव्रता स्त्री थी। उसके पतिव्रत धर्म के बल पर ही जालंधर में असीम शक्तियां समाहित थी जिससे वो स्वंय को अजर अमर समझने लगा था और अपनी कुदृष्टि माता लक्ष्मी एंव माता पार्वती पर गाढ़े बैठा था।

माता लक्ष्मी का जन्म भी समुद्र मंथन के समय हुआ था इसलिए उन्होंने राक्षस जालंधर को अपना भाई स्वीकार किया। माता पार्वती को पाने की लालसा में जब वह कैलाश पर्वत पर गया तो माता पार्वती वहां से लुप्त हो गई। भगवान शिव को जब जालंधर के आने का प्रयोजन ज्ञात हुआ तो दोंनों में भयंकर युद्ध होने लगा।

 माता पार्वती ने भगवान विष्णु को जालंधर की बुरी नियत के बारे में अवगत करवाया। जब तक जालंधर के साथ उसकी पत्नी का पतिव्रत धर्म था उसे पराजित करना असंभव था। अत: भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धर कर वृदां का पतिव्रत धर्म भंग कर दिया। वृदां का पतिव्रत धर्म भंग होते ही जालंधर युद्ध में पराजित हुआ। जब वृदां को भगवान विष्णु के छल का ज्ञात हुआ तो उन्होंने भगवान को शिला होने का क्षाप दे दिया और स्वंय भस्म हो गई। जिस स्थान पर वह भस्म हुई उस स्थान पर तुलसी के पौधे का जन्म हुआ।

भगवान विष्णु ने तुलसी रूपी वृंदा को वरदान दिया की तुम मुझे श्री लक्ष्मी जी से भी अत्यधिक प्यारी हो और तुम सदैव मेरे साथ रहोगी। तुम्हारे अभाव में न तो मेरा कोई भोग पूर्ण होगा और न ही पूजा। उसी स्थान पर सती वृंदा का मंदिर बन गया जो वर्तमान में मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है।

श्री देवी तालाब मंदिर 51 शक्ति पीठों में से एक है। पावन सरोवर के मध्य में स्थित मंदिर में मां दुर्गा, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती के श्री रूप विद्यमान हैं। त्रिपुरमालिनी माता के मंदिर में देवी सती का दाहिना वक्ष गिरा था। प्रत्येक वर्ष यहां श्री हरिबल्लभ संगीत सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। मंदिर परिसर में हस्पताल, लंगर हाल, धर्मशाला और कैंटीन की सुविधा उपलब्ध है। मंदिर की परिक्रमा करते समय सनातन धर्म के अन्य देवी देवताओं के मंदिर हैं जैसे प्राचीन महाकाली मंदिर, मां वैष्णों देवी की गुफा, अमरनाथ की गुफा, बाबा हेमगिरि जी की समाधि, श्री राम दरबार आदि हैं। जो श्रद्धा और भक्ति का केंद्र हैं। दोआबा चौक के नजदीक टांडा रोड मार्ग पर श्री देवी तालाब मंदिर स्थित है।

श्री सिद्ध बाबा सोढल जी का मन्दिर और तालाब लगभग 200 वर्ष पुराना है। उससे पहले यहां चारों ओर घना जंगल होता था। दीवार में उनका श्री रूप स्थापित है। जिससे मंदिर का स्वरूप दिया गया है। अनेक श्रद्धालुजन अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंदिर में आते हैं। यह मंदिर सिद्ध  स्थान के रूप में प्रसिद्ध है। यहां एक तालाब है जिसके चारों ओर पक्की सीढिय़ां बनी हुई हैं तथा मध्य में एक गोल चबूतरे के बीच शेष नाग का स्वरूप है। भाद्रपद की अनन्त चतुर्दशी को यहां विशेष मेला लगता है। चड्ढा बिरादरी के जठेरे बाबा सोढल में हर धर्म व समुदाय के लोग नतमस्तक होते हैं। अपनी मन्नत की पूर्ति होने पर लोग बैंड-बाजों के साथ बाबा जी के दरबार में आते हैं। बाबा जी को भेंट व 14 रोट का प्रसाद चढ़ाते हैं जिसमें से 7 रोट प्रसाद के रूप में वापिस मिल जाते हैं। उस प्रसाद को घर की बेटी तो खा सकती है परन्तु उसके पति व बच्चों को देना वर्जित है। वर्तमान में यह मंदिर सोढल रोड पर विद्यमान है।


 



 


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