क्या भारत में पुन: राम राज्य स्थापित हो पाएगा?

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Thursday, March 06, 2014-9:27 AM

धर्मग्रंथों में कहा गया है कि सबके साथ समान व्यवहार करो क्योंकि सभी एक हैं। सामाजिक न्याय है शांति का रास्ता। आज रामराज की परिकल्पना सामाजिक न्याय से ही संभव है। किसी भी देश की तरक्की तभी संभव है जब सबको अधिकार मिलें। समाज के हर तबके को उसका हक दिए बिना शांति स्थापित नहीं की जा सकती।

श्रीरामचरितमानस


राम राज बैठे त्रैलोका।
हरषित भए गए सब सोका।।
बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।
सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी।
सब कृतज्ञ नहिं कपट सयानी।।
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥।

रामराज्य की कल्पना सामाजिक न्याय का ही ताना-बाना थी। लोग खुशहाल थे, सबको एक नजर से देखा जाता था। जातियां तो थीं पर लोग एक-दूसरे को ऊंच-नीच नहीं मानते थे। हर जगह सामाजिक सद्भाव था। तुलसीदास ने रामचरितमानस में इसका वर्णन किया है। भगवान राम के सिंहासन पर आसीन होते ही चारों ओर खुशी की लहर दौड़ गई। सब भय-शोक दूर हो गए। दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति मिल गई। कोई भी अल्प मृत्यु, रोग-पीड़ा से ग्रस्त नहीं रहा। समाज में विषमता समाप्त हो गई। लोगों में कोई बैर-भाव नहीं रहा। राम ने तिरस्कृत समाज को मुख्यधारा में वापस लाने और उन्हें सम्मान दिलाने का काम किया।

तुलसीदास ने लिखा है कि जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी और अभावग्रस्त जीवन जी रही है वह नरक का अधिकारी है। आज जब हम बात करते हैं समाजिक न्याय की तो हमें राम से सीख लेनी चाहिए कि समाज में सभी वर्ग के लोगों को उनका हक मिले।


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