सावन में आसमानी बिजली शिवलिंग को विभक्त कर देती है और फिर जानिए क्या होता है...

  • सावन में आसमानी बिजली शिवलिंग को विभक्त कर देती है और फिर जानिए क्या होता है...
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Monday, March 10, 2014-7:29 AM

हिमाचल प्रदेश का खूबसूरत शहर कुल्लू ब्यास नदी के तट पर 1230 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। जो प्राचीन काल में सनातन धर्म के देवी देवताओं का स्थायी बसेरा था। कुल्लू का उल्लेख रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण आदि महान ग्रंथों में भी मिलता है। कुल्लू का बिजली महादेव मंदिर अथवा मक्खन महादेव संसार का अनूठा एवं अदभुत शिव मंदिर है। यह मंदिर ब्यास नदी के किनारे मनाली से करीब 50 किलोमीटर दूर समुद्र स्तर से 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। चनरासी गांव का यहां आखिरी पड़ाव पड़ता है।
 
बिजली महादेव मंदिर अथवा मक्खन महादेव मंदिर संपूर्ण रूप से लकडी से र्निमित है। चार सीढियां चढ़ने के उपरांत किवाड़ से एक बडे कमरे में जाने के उपरांत गर्भ गृह है। जहां मक्खन में लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं। यह स्तंभ 60 फुट लंबा है।

धर्म शास्त्रों के मतानुसार भगवान शिव जी ने सागर पुत्र जालन्धर दैत्य का वध इसी स्थान पर किया था। मंदिर में लकड़ी का एक बहुत ऊंचा खम्बा है जिसके विषय में बताया जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन के महीने में इस खंबे से ​गुजरकर बिजली गिरती है जो शिवलिंग को कुछ भागों में विभक्त कर देती है। इस घटना के उपरांत मंदिर के पुजारी स्थानीय गांव से विशिष्ट मक्खन मंगवाते हैं। जिससे शिवलिंग को फिर से उसी आकार में जोड़ दिया जाता है। अगर बिजली के प्रकोप से ध्वज दंड़ को हानि होती है तो फिर संपूर्ण शास्त्रिय विधि विधान से नवीन ध्वज दंड़ की स्थापना कि जाती है।

इस स्थान को कुलांत पीठ, कुलूत देश, देवधरा और रहस्य भूमि कहा जाता है क्योंकि प्राचीन काल में इस समूचे क्षेत्र पर कुलान्त नामक दैत्य का आतंक था। भू वासियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव ने उसका वध कर दिया। कुलान्त के मरते ही उसका शरीर एक विशाल पर्वत में परिवर्तित हो गया यानी कुलान्त दैत्य का शरीर जितने भू-भाग में फैला था वह समूचा क्षेत्र पर्वत में बदल गया। वर्तमान कुल्लू घाटी का बिजली महादेव मंदिर से लेकर रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित मानी जाती है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। व्यास नदी पार कर 15 किमी का सडक मार्ग चंसारी गांव तक जाता है। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य,खडी चढ़ाई है। सावन के महीने और शिवरात्रि पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है। यह एक कठिन चढ़ाई वाला रास्ता है। जहां देवदार के अनगिनत पेड़, पार्वती और कुल्लू घाटियों के सुंदर दृश्यों को देखा जा सकता है।





 




 


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