कृष्णावतार

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Monday, March 10, 2014-8:23 AM

तभी दो व्यक्ति झोंपडिय़ों से निकले। उनमें से एक के पास धनुष-बाण भी था। प्रद्युम्र जी ने उनमें से एक से उसका नाम पूछा। इस पर उन दोनों व्यक्तियों ने अपने हाथ कानों पर रख कर सिर से इशारा किया कि हम तुम्हारी बोली नहीं समझते। उसी समय एक अन्य व्यक्ति झोंपड़ी से निकल कर आ गया। वह पूरे हथियारों से लैस था और कोई मुखिया मालूम होता था। उसने इशारे से उन्हें वहां से चले जाने को कहा।

प्रद्युम्र जी शंभर दानव के भवन में पल कर बड़े हुए थे और वह दानवों की भाषा भी बोलते थे। उन्होंने उसी भाषा में मुखिया को बताया कि मैं धर्म के रक्षक श्रीकृष्ण वासुदेव का भेजा हुआ आया हूं। मैं महाबली महाराजाधिराज शंभर से भेंट करूंगा (शंभर अपनी प्रजा से स्वयं को महाबली महाराजाधिराज कहलवाता था)।


श्री प्रद्युम्र जी के मुख से महाबली को वासुदेव का उपदेश सुनाने की बात सुन कर सभी दानव हंस पड़े जैसे उन्होंने कोई अत्यंत हास्यास्पद बात कह दी हो। इसके बाद मुखिया ने प्रद्युम्र जी तथा उनके साथियों को संकेत से समझाया कि तुम लोगों को इसी बस्ती में ठहरना होगा। यदि तुमने भागने का प्रयत्न किया तो मार डाले जाओगे।


इतना कह कर मुखिया ने उन सबसे शस्त्र ले लिए और इसके बाद उन ऊंटों पर दृष्टिïपात किया जिन पर सवार होकर प्रद्युम्र जी तथा उनके साथी आए थे। फिर उनमें से एक ऊंट पर सवार होकर मुखिया चल दिया।
                                                                                                                                                                                 (क्रमश:)


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